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भारतीय ज्ञान विश्व में नकारात्मक भावनाओं को मिटाने में हो सकता है मददगार

भारतीय ज्ञान विश्व में नकारात्मक भावनाओं को मिटाने में हो सकता है मददगार

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धर्मशाला। तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा ने प्राचीन भारतीय ज्ञान की सराहना की है। उन्होंने कहा कि भारत का इतिहास और भारतीय ज्ञान विश्व में नकारात्मक भावनाओं को मिटाने में मददगार साबित हो सकता है। अगर हम भारत के ज्ञान को स्वीकार करें तो विश्व में शांति का संदेश दिया जा सकता है। दलाई लामा ने कहा कि प्राचीन भारतीय ज्ञान के पुनरुद्धार पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं जो मुख्य रूप से अहिंसा और करुणा को बढ़ावा देता है। दुनिया को इस ज्ञान की अधिक आवश्यकता है। शुक्रवार को दलाई लामा ने धर्मशाला महाविद्यालय (Dharamshala College) में ‘प्राचीन भारतीय ज्ञान’ विषय में अध्ययनरत विद्यर्थियों एवं विशिष्ट अतिथियों को भारत के प्राचीन ज्ञान के बारे में बताया।

उन्होंने बताया कि किस तरह भारत से सीख ले कर हम सब विश्व में शांति से रह सकते हैं। दलाई लामा ने बौद्ध दुनिया में भारत की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला और कहा कि यदि देश आधुनिक शिक्षा के साथ भावनाओं और आध्यात्मिकता के अपने प्राचीन ज्ञान को जोड़ने में अग्रणी है, तो भारत कई बौद्ध देशों के लिए प्रेरणा बन जाएगा। उन्होंने कहा कि हम सब को आजीवन प्रतिबद्धताओं में से एक आधुनिक भारत में शिक्षा प्रणाली में शामिल करके इस प्राचीन और वैज्ञानिक परंपरा को पुनर्जीवित करना चाहिए। उन्होंने बच्चों को बचपन से ही पर्यावरण के बारे में शिक्षा प्रदान करने की बात कही और कहा कि हमें पर्यावरण की आवश्यकता पर बल देने की जरूरत है।

हमें जलवायु परिवर्तन जैसे वैश्विक चुनौतियों का सामना करने के लिए एक साथ मिलकर काम करना होगा । हम केवल इस धरती तथा इसके प्राकृतिक पर्यावरण का दोहन करते नहीं रह सकते, हमें इसकी देखभाल भी करनी होगी। आज हम जिन भीषण समस्याओं का सामना कर रहे हैं, इनके बारे में वैज्ञानिक कई वर्षों से हमें चेतावनी देते आ रहे हैं। भारत में सदियों से फलफूल रहे धार्मिक सद्भाव की भावना की सराहना करते हुए कहा यहां इस देश में सैकड़ों वर्षों से सभी धार्मिक परम्पराएं एक साथ शांति से रह रहे हैं । उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि यह सम्पूर्ण विश्व के लिए एक मिसाल है कि सभी धार्मिक परंपराएं एक साथ रह सकती हैं ।


दलाई लामा ने दिए श्रोताओं के प्रश्नों के उत्तर

दलाई लामा ने श्रोताओं के प्रश्नों का उत्तर देते हुये कहा कि पुनर्अवतार का विषय शारीरिक नहीं हैं बल्कि चित्त-संतति से जुड़ा हुआ है। हमारे क्षणिक-चित्त का उपादान कारण उसके पूर्व का क्षणिक-चित्त है। दलाई लामा ने कहा हालांकि शारीरिक रूप से मैं भारत में हूं लेकिन मेरा मन बार-बार तिब्बत में रहता है। मैं हमेशा याद रखता हूं कि मेरी जिम्मेवारी तिब्बत में रह रहे 6 मिलियन तिब्बतियों के प्रति है जो मेरे विश्वास रखते हैं। बहुत से तिब्बती मेरे तिब्बत वापस लौटने के बारे में उत्सुक हैं, लेकिन वो सराहना करते हैं कि दलाई लामा एक आज़ाद देश में रह कर आज़ादी से बात कर सकते हैं।

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