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दलाई लामा संस्था के बारे में तिब्बती फैसला करें, लेकिन एक आजाद देश में

दलाई लामा संस्था के बारे में तिब्बती फैसला करें, लेकिन एक आजाद देश में

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बोधगया। तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा ने एक बार फिर कहा है कि दलाई लामा संस्था का रहना या न रहना तिब्बतियों के फैसले पर निर्भर करता है। लेकिन इस बात का फैसला एक आजाद देश में होना चाहिए तिब्बत में नहीं, जहां आजादी नाम की कोई चीज ही नहीं है। दलाई लामा यहां धर्म प्रवचन के लिए आए हुए हैं।

अमेरिका बहुत दूर है

उनके स्वास्थ्य को लेकर पूछे गए एक सवाल के जवाब में 84 साल के तिब्बती धर्मगुरु ने कहा, ‘काफी अच्छा हूं। इस उम्र में यही कहना चाहिए। मैं धर्मशाला में सुबह की सैर करता हूं और यहां भी मठ में 600 कदम जरूर चलता हूं।’ अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात को लेकर पूछे गए एक सवाल के जवाब में दलाई लामा ने कहा, ‘मैं पिछले 2 साल से अमेरिका नहीं गया।

अमेरिका बहुत दूर है और मैं इतनी लंबी यात्रा करने का शारीरिक कष्ट बर्दाश्त नहीं कर सकता। ऐसे में अमेरिका जाकर इलाज कराने के बजाय मैं दिल्ली के किसी निजी अस्पताल में जाना पसंद करूंगा।’

तिब्बत लौटने का मतलब नहीं

अपने देश तिब्बत लौटने के बारे में सवाल पर दलाई लामा ने कहा, ‘मैं भावनाओं पर नियंत्रण रखने वाले प्राचीन भारतीय ज्ञान को अपनाने पर प्रतिबद्ध हूं। मेरा तिब्बत लौटने का कोई मतलब नहीं, क्योंकि वहां कोई आजादी नहीं है। मैं भारत में रहना पसंद करूंगा, क्योंकि यहां आजादी है। और फिर मैं भारत का सबसे लंबी अवधि का मेहमान भी हूं।’

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