जन्मदिवस विशेष : वर्षों बाद समझा दलाई लामा होने का मतलब

जन्मदिवस विशेष : वर्षों बाद समझा दलाई लामा होने का मतलब

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वह तिब्बतियों के धर्म प्रमुख ही नहीं, विश्व शांति के दूत भी हैं। आधी सदी से ज्यादा समय से वह निर्वासन में हैं। बेशक वह चीन की आंखों में खटकते हैं, लेकिन उनका व्यक्तित्व ऐसा है कि सामने पड़ जाएं तो मन में असीम श्रद्धा व सम्मान की भावना उमड़ने लगती है। जी हां, बात हो रही है दलाई लामा (Dalai Lama) की जिनका आज 84 वां जन्मदिवस है। खास बात यह है कि 14वें दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सो दलाई लामा होने का मतलब लंबे समय बाद समझ पाए थे। तेनजिन ग्यात्सो को जिस समय दलाई लामा के तौर पर मान्यता मिली थी, उस वक्त वे मात्र दो वर्ष के थे।


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कुंबुम मठ में अभिषेक के बाद उन्हें माता-पिता का ज्यादा साथ नहीं मिल पाया। कारण सीधा था ल्हासा से दस किमी दूर उतर-पूर्वी दिशा में पैदा हुआ दो वर्षीय बालक लहामो चेढप दलाई लामा बन चुका था। उसकी शिक्षा-दीक्षा उसी अनुरूप होनी थी। महामहिम ने स्वयं एक किताब (Book) में लिखा है कि एक छोटे बच्चे के लिए मां-बाप से इस तरह अलग रहना सचमुच बहुत कठिन होता है। उस वक्त तो उन्हें यह भी पता नहीं था कि दलाई लामा होने का मतलब क्या है। उन्हें सिर्फ यही पता था कि मैं दूसरे कई छोटे बच्चों की तरह एक छोटा बच्चा था। बचपन में उन्हें एक खास शौक था कि वह एक झोले में कुछ चीजें डालकर उन्हें कंधे पर लटका लेते थे व ऐसा नाटक करते थे कि कि एक लंबी यात्रा (Long journey) पर जा रहे हैं। अक्सर कहा करते थे कि वे ल्हासा जा रहे हैं। महामहिम खाने की मेज पर हमेशा जिद करते थे कि मुझे सबसे प्रमुख स्थान पर बिठाया जाए।

15 वें साल में राजनीतिक जिम्मेदारियों का निर्वाह

दलाई लामा जब केवल 15 वर्ष के थे तो उन्होंने अपनी सरकार के वरिष्ठ होने के नाते राजनीतिक जिम्मेदारियों (Political responsibilities) का निर्वाह शुरू कर दिया था। वर्ष 1954 में महामहिम चीनी नेताओं से बातचीत करने चीन की राजधानी बीजिंग गए, जब चीन तिब्बत के बारे में असहयोगपूर्ण रवैया अपनाए हुए था। वर्ष 1956 में वे महात्मा बुद्व की 2500वीं वर्षगांठ पर भारत आए व तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से तिब्बत की दुर्दशा पर लंबी बातचीत की। अंततः तिब्बत में चीन सरकार के बढ़ते आतंक से उत्पन्न खतरे को भांपकर उन्हें 1959 में तिब्बत छोडने के लिए मजबूर होना पड़ा।

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