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टुकड़ा-टुकड़ा आकाश

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love story: मंगला के पहाड़ों के ठीक सामने रावी बहती है तेज रफ्तार रावी।
मंगला… यानी हरियाली का एक छोटा सा टुकड़ा । इस प्राकृतिक कैनवास पर एक  प्यारा सा तिकोनी  हरी छत वाला घर है जो देखने में किसी पेंट की गई तस्वीर की तरह लगता है। आसपास चीड़ के पेड़ों को छूकर आती हवा  उस घर की खिड़कियों के जालीदार पर्दों को छेड़ती रहती है। घर के आगे  छोटा सा लॉन है  और गेट पर लिखा है- डा. कोयल माथुर
इस घर में बस दो औरतें रहती हैं । कोयल जो गर्ल्स स्कूल में लेक्चरर है और दूसरी उसकी नौकरानी जो उसके साथ ही रहती है। अपना कहने को कोयल के पास ढेरों चाही -अनचाही यादें हैं ,जिन्हें वह जब भी अकेली होती है तो सिलसिलेवार दोहराया करती है । बहुत बार सोचा है उसने कि मां पापा ने उसका नाम कोयल क्यों रखा…क्या उसके सांवले रंग के कारण ?
कोयल कहानियां लिखती है और उसने एक बात बहुत अच्छी तरह जान ली है, कि जिस सुंदर कल के सपने हम लोग इतने प्यार से देखते हैं,वह कल आता तो है ,पर समय की उस तस्वीर से बहुत सारे लोग गायब होते हैं । कोयल के जीवन की तस्वीर  से भी बहुत सारे लोग गायब हैं …मां, पापा …छोटा भाई राजू। यह सब अचानक ही घट गया था । पहाड़ खूबसूरत भी हैं और जानलेवा भी । आए दिन एक्सीडेंट होते रहते हैं  और लोग इन हादसों के इतने आदी हो चुके हैं  कि कहीं जाते हैं  तो अपना नाम पता लिख कर साथ रख लेते हैं कि अगर कुछ हो गया तो लाश तो घर पहुंच जाएगी। ऐसे ही एक हादसे में उसका पूरा परिवार खत्म हो गया था । वह घर पर रह गई थी इसलिए जिंदा बच गई।
सुबह से ही पहाड़ों पर गहरी धुंध है । जब भी ऐसा मौसम होता है तो कोयल अपने बरामदे  में बैठी घाटी से होकर गुजरते बादलों को देखा करती है। बादलों की गोल-गोल परत घूमती हुई घाटी में समा जाती है  फिर सारे पेड़ इस गहरी धुंध में खो जाते हैं। 
उसकी जिंदगी ,जिसकी कहानी के बहुत सारे पात्र गायब हैं। कुछ तो हादसे ने छीन लिए और कुछ अपने आप आए और चले गए। अमर उसके बचपन का साथी …कितने  सालों तक उसके साथ साए की तरह रहा, अब विदेश में एक यूनिवर्सिटी में पढ़ाता है । कभी- कभार खत लिखता है -कोयल क्यों नहीं तुम फ्रेंच क्लास ज्वाइन कर लेतीं दिल लगा रहेगा । अमर उसका बहुत प्यारा दोस्त है पर कोयल फ्रेंच क्लास नहीं ज्वाइन कर पाती। बस जितने प्यार से वह खत लिखता है ,उतने ही प्यार से वह जवाब दे देती है ,कि इस बार वह  जरूर फ्रेंच क्लास ज्वाइन कर लेगी ,पर उसकी यह  बात कभी सच में नहीं बदलती।
इस पठार के किनारे जंगली गुलाबों की पूरी बेल्ट चली गई है । वसंत के मौसम में जब सारे खेत सरसों के पीले फूलों से रोशन होते हैं तो गुलाबों की इस प्राकृतिक क्यारी से सारी हवा महक उठती है। सरसों के पीले फूल जैसे दूर तक झीनी पीली चादर बिछा दी गई हो । इन्हीं फूलों की बगल  से गुजरकर ढलान उतरती है और लाइब्रेरी तक जाती है। वह ऐसा ही मौसम था जब उसे नील मिला था। वे साथ-साथ लाइब्रेरी तक गए थे और लौटे भी साथ ही थे ।
नीलकांत शहर में डी.सी. की पोस्ट पर आया था वह हर रविवार लाइब्रेरी जरूर आता था । वे दोनों उसके बाद भी मिले थे। पहले परिचितों की तरह ..फिर दोस्तों की तरह । ज्यादातर उनकी मुलाकात लाइब्रेरी में ही होती थी।कोयल को उसके व्यक्तित्व में हमेशा नए पहलू नजर आते थे । एक दिन उसने पूछ ही लिया था ।
-आप डी.सी. तो नहीं ,पर ग्रैज्युएट स्टूडेंट जरूर लगते हैं।
-मजबूरी है .. कभी-कभी चेहरे कुर्सी की गवाही नहीं देते। वह धीमे से हंस दिया था…।
-मेरे कहने का मतलब था कि आपकी जॉब और किताबों  के प्रति आपका लगाव  दोनों ही एक दूसरे से एकदम अलग हैं। फिर आपकी रुचि साहित्य में है यह हैरानी की बात नहीं ?
नील के चेहरे पर एक छाया सी आकर लौट गई।
– वह इसलिए कि जब भी हमारा मानसिक स्तर हमारे परिवेश से मेल नहीं खाता ,ऐसे में किताबों को दोस्त बना लेना बेहतर होता है।किस-किस से कहता फिरूंगा कि मेरे कहने , मेरे सोचने के अनुसार चलो।  मैंने सुना है कि तुम भी कहानियां लिखती हो ।भला कैसी कहानियां लिखती हो…तुम ?
– प्रेम कहानियां … वह अनमनी सी बोल गई थी ।
एक निर्मम ठहाका लगा कर हंस पड़ा था वह।
– यह क्या कोयल सारी दुनिया में आग लग गई है ,लोग हत्याएं करते नहीं हिचकते। शरीफ से शरीफ आदमी को अब दरिंदा बनते देर नहीं लगती …लड़कियां अगवा हो रही हैं रोज बलात्कार हो रहे हैं  और तुम प्रेम कहानियां लिख रही हो । यह लेखक का धर्म नहीं…धरातल पर जीना सीखो।
– शायद मैं पलायनवादी हूं …और जो अच्छा हमारे बीच से खो गया है उसकी कल्पना करके ही जी लेती हूं या फिर अकेले होने के कारण मेरे अंदर विद्रोह करने का साहस नहीं रहा।
-पलायनवाद अपराध है …तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए  उसने गंभीरता से कहा था।
पूरे एक साल का वक्त गुजर गया । एक दिन नील ने उसे जबरदस्ती लाइब्रेरी के लॉन में रोक लिया ।  शायद कुछ बात करना चाहता था… वह उसकी बात सुनने के लिए रुक गई। वह उसे लिए वहीं फव्वारे के पास लगी एक बेंच पर बैठ गया
-मैं शुरुआत एक सवाल से करता हूं…तुम कहानियां लिखती हो  न ,और कहानी का आदि-अंत सब सही जगह पर रखती हो ,पर मान लो  किसी कहानी का आदि -अंत, बीच सबकुछ उलट-पलट जाए तो ।
-फिर वह कहानी  कहां रहेगी..उसका कोई अर्थ ही नहीं होगा।
-बस ऐसा ही हुआ है …तुम उसे कहानी कहो या जीवन,उसका कोई अर्थ नहीं  रह जाता …अब जैसे कि…
– क्या जैसे कि …कोयल उसे हैरान -सी देखती रही …यह कौन सा जीवन दर्शन उसे समझा रहा  था नीलकांत। 
-जैसे कि तुम्हारारा मुझसे मिलना पांच साल पहले भी हो सकता था। तब मैं अकेला था स्वतंत्र …अपनी जिंदगीका मालिक। 
बात सीधी थी और बेहद ईमानदारी से कही गई थी …कोयल ने आंखें फेर लीं और जाने के लिए उठ खड़ी हुई।
-ठहरो मैं छोड़ देता हूं शाम हो रही है अकेले जाना ठीक नहीं… कहकर वह साथ हो लिया था। वे रावी के पुल से होकर गुजरे तो पल भर को वह ठिठक गई। रावी का प्रवाह तेज था  हमेशा की तरह। चट्टानों पर सिर पटकता पानी। नील उसे घर तक छोड़ कर चला गया। बहुत देर तक वह उसकी कही बात पर सोचती रही…यह एक ऐसी शुरुआत थी जिसका कोई सिरा कहीं नहीं जाता था।
कहने को तो नील एक बड़ा अफसर था पर अपनी भावनाओं में  बेहद अनछुआ सा था। वे गर्मियों के दिन थे  और कोयल को कॉलेज से लौटते वक्त सड़क पर ही नील मिल गया था । वह अपने घर से निकल रहा था ,पर कोयल को देख कर उसे लिए फिर वापस हो लिया। कोयल को प्यास लगी थी ,उसके हाथों में पानी का ग्लास थमाते हुए वह बोला था।
-मैं मजाक नहीं कर रहा  पर यह सच है कि अगर तुम कुछ दिन पहले मिल जातीं  तो मैं तुम्हें उठा ले जाता दुनिया की नजरों  से कहीं दूर।
-सो तो तुम अभी भी कर सकते हो …कोयल खिलखिला उठी।
-कोयल… उसकी आवाज कांप गई। तुम कहीं पागल तो नहीं हो गई हो या फिर मेरी तमन्ना यूं तुम्हारे सिर चढ़कर बोलने लगी है…उसकी हथेली अपने हाथों में भींच कर उसने कहा था।
-संभाल लूंगी मैं अपने आपको ,पर तुम चाहो तो मन आई कर सकते हो।
– तुम एक अच्छी लड़की हो और मैं तुम्हारी बहुत इज्जत करता हूं…वह गंभीर हो गया। 
नील जो उसे समझाना चाहता था वह समझ गई थी। वह नील का हाथ पकड़ कर ही सोच की उस लहर से बाहर निकल आई।
-नील तुम्हारे ऊपर यह शर्ट  बहुत अच्छी लगती है।
-मेरे भाई ने दी थी .
-यह भी कोई बात हुई।
-हुई क्यों नहीं …जैसे कि यह घड़ी पापा ने दीथी  और जूते …हां जूते मेरे अपने हैं।
-ओह नील… हंसी के आवेग से कोयल की आंखों में पानी भर आया।
जिस दिन नील का तबादला हुआ पहली बार उसने नील की आंखों में  आंसू देखे। बारिश उसी समय होकर  बंद हुई थी। भीगी सड़क पर उसके साथ चलता नील बेहद उदास था।
-में खत लिखूंगा, जवाब दोगी…?
-नहीं… उसने मुंह फेर लिया।
-कितनी क्रुअल हो गई हो तुम…उसका गला भर आया।
-कोयल ने भर आंख उसे देखा ,मैं जानती हूं …जिंदगी में मनचाहा बड़ी मुश्किल से मिलता है, पर मैं तुम्हारे परिवार का अहित नहीं करना चाहती। तुम्हारी पत्नी और बच्चों की छोटी सी दुनिया है …उसी में खुश रहना।
-तुम जानती थीं …?
-हां पता था मुझे…इसलिए…उसने उतनी ही हिम्मत से नील का हाथ थामा और छोड़ दिया। मोड़ पर उसने पलट कर देखा , वह वहीं खड़ा था उसकी ओर देखता हुआ।
वह उनकी आखिरी मुलाकात थी। ढेरों सूने-सूने से वर्ष कोयल ने यों ही गुजर जाने दिए। न वह किसी को अपना बना पाई और न ही नील को भूल सकी।उसके पास अब  भावनात्मक पूंजी के नाम पर बस कहानियां थीं । उसकी  कोई भी कहानी छपती तो काफी दिनों तक खतों का सिलसिला न थमता। हैरान होती थी कोयल …क्या सचमुच लोग अब भी कहानियां पढ़ते हैं…? कहानियां अब बीती बात हो गई हैं। जिंदगी की इस भाग -दौड़ में  किसी को फुर्सत नहीं । पुरुष ,स्त्री,गृहिणियां…कामकाजी महिलाएं सब जैसे किसी तेज रफ्तार में बहे जा रहे हैं  । समान लय से एक निश्चित दिशा की ओर गतिशील…।
पल भर के लिए रुके ,टीवी ऑन किया खबरों पर नजर डाली और घर से बाहर । आज अखबार की हेडलाइनों पर नजर डाल कर  लोग छुट्टी पा लेते हैं, फिर कहानियां कौन पढ़ता होगा ?
पर कोयल का ख्याल गलत था  लोगों के खत गवाह थे  कि वे न सिर्फ कहानियां पढ़ते थे बल्कि उन पर अपनी राय देने के लिए वक्त भी निकाल लेते थे। इन्हीं आने वाले खतों में एक खत ऐसा भी था जो अपने होने का एहसास दिला गया था।लिखा था-
आपकी कहानियां पढ़ते-पढ़ते कहीं मैं अंतर्मन से ही आपकी उदासी को प्यार करने लगा हूं। आप इसे स्वीकार करें ऐसा नहीं कहूंगा ,पर अपना चाहना रोक भी तो नहीं सकता।
डर सी गई थी कोयल …नील बेतरह याद आया था। कोयल ने उस खत का कोई जवाब नहीं दिया। जिस तकलीफ को वह महसूस कर रही थी वह नहीं चाहती थी कि उसे भी वही तकलीफ मिले। अच्छा है …जो कुछ जहां है वहीं रहे दबा ढंका, अनाघ्रत पुष्प की तरह।
कभी कभी  कोयल को लगता है कि उसके प्यार का आकाश कई टुकड़ों में बंट गया है।
अमर उसके बचपन का दोस्त जो उसे तकलीफों से बचने के लिए फ्रेंच पढ़ने की सलाह देता था।
(कोयल कभी नहीं पढ़ पाई)
नील जिसे उसने तहेदिल से प्यार किया वह उसे छोड़ना नहीं चाहता था ।
(कोयल स्वीकार नहीं कर पाई …उसे मिस्ट्रेस बनना मंजूर नहीं था )
साहिल जो अपने मासूम प्यार के साथ उसके सामने था …उससे मिलना चाहता था
( कोयल ने उससे कोई संपर्क नहीं किया …वह उसकी मासूमियत को आघात नहीं देना चाहती थी।
पर अकेले में कई बार उसने सोचा है कि क्या उसके प्यार का आकाश पूरा नहीं हो सकता था ताकि उसने किसी एक के नाम अपनी पूरी जिंदगी लिख दी होती।

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