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वट सावित्री व्रत कथा : सावित्री के आगे झुके यमराज, लौटाए पति के प्राण

वट सावित्री व्रत कथा : सावित्री के आगे झुके यमराज, लौटाए पति के प्राण

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मद्र देश में अश्वपति नाम का एक बड़ा ही धार्मिक राजा हुआ करता था, जिसकी पुत्री का नाम सावित्री था। सावित्री जब विवाह योग्य हो गई तब महाराज उसके विवाह के लिए बहुत चिंतित थे। महाराज अपनी पुत्री के लिए योग्य वर ढूंढने के लिए बहुत प्रयास किए परन्तु अपनी पुत्री के लिए योग्य वर नहीं ढूंढ सके तब अन्ततः उन्होंने सावित्री से कहा कि वह स्वयं ही अपने योग्य वर चुनकर उससे विवाह कर ले। तब राजकुमारी शीघ्र ही वर की तलाश में चल दी। तलाश करते करते वह शाल्व देश के राजा के पुत्र सत्यवान जो जंगल में ही पले बढे़ थे को अपने पति के रूप में स्वीकार कर लिया।

राजकुमारी अपने देश लौटकर दरबार में पहुंची तो और राजा देवर्षि नारद जी से मंत्रणा कर रहे थे राजा ने अपनी पुत्री से वर के चुनाव के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि उन्होंने शाल्वदेश के राजा के पुत्र को पति रूप में स्वीकार किया है, जिसका नाम सत्यवान है तब नारदजी ने कहा जो वर सावित्री ने चुना है उसकी आयु बहुत ही कम है। वह सिर्फ एक वर्ष के बाद मरने वाला है। उसके बाद वह अपना देहत्याग देगा तब सावित्री ने कहा पिताजी जिसे मैंने एक बार वरण कर लिया है। मैं उसी से विवाह करूंगी। उसके बाद सावित्री का सत्यवान से पूरे विधि-विधान से विवाह करवा दिया गया।


विवाह के कुछ समय बीत जाने के बाद जिस दिन सत्यवान मरने वाला था वह दिन नजदीक आ चुका था। सावित्री एक-एक दिन गिनती रहती थी। उसके मन में नारदजी का वचन सदा ही बना रहता था। जब उसने देखा कि अब इन्हें चौथे दिन मरना है। उसने तीन दिन तक व्रत धारण किया। जब सत्यवान जंगल में लकड़ी काटने गया तो सावित्री ने उससे कहा कि मैं भी साथ चलूंगी। तब सत्यवान ने मना किया लेकिन सावित्री नहीं मानी उसने जिद पकड़ ली और सत्यवान के साथ जंगल की ओर चल दी सत्यवान जब लकड़ी काटने लगा तो एकदम उसकी तबीयत खराब होने लगी। तब सावित्री ने सत्यवान का सिर अपनी गोद में रख लिया।

पुनः वह नारदजी की बात स्मरण कर मन ही माह दिन व समय का विचार करने लगी। वैसे ही वहां एक भयानक पुरुष दिखाई दिया जिसके हाथ में पाश था। वे यमराज थे। सावित्री ने पूछा आप कौन हैं तब यमराज ने कहा मैं यमराज हूं। इसके बाद यमराज ने सत्यवान के शरीर में से प्राण निकालकर उसे पाश में बांधकर दक्षिण दिशा की ओर चल दिए।

सावित्री बोली मेरे पतिदेव को जहां भी ले जाया जाएगा मैं भी वहां जाऊंगी तब यमराज ने उसे समझाते हुए कहा मैं उसके प्राण नहीं वापस नहीं लौटा सकता हूं पतिव्रता स्त्री होने के कारण मझसे मनचाहा वर मांग लो। सावित्री ने वर में अपने श्वसुर की आंखें मांग ली। यमराज ने कहा तथास्तु। उसके बाद भी सावित्री उनके पीछे-पीछे चलने लगी तब यमराज ने उसे पुनः समझाया और वर मांगने को कहा उसने दूसरा वर मांगा कि मेरे श्वसुर को उनका पूरा राज्य वापस मिल जाए। उसके बाद तीसरा वर मांगा मेरे पिता जिन्हें कोई पुत्र नहीं हैं उन्हें सौ पुत्र हों। यमराज कहा तथास्तु। पुनः सावित्री उनके पीछे-पीछे चलने लगी यमराज ने कहा सावित्री तुम वापस लौट जाओ चाहो तो मुझसे कोई और वर मांग लो।

तब सावित्री ने कहा मुझे सत्यवान से सौ यशस्वी पुत्र हों। यमराज ने कहा तथास्तु। यमराज फिर सत्यवान के प्राणों को अपने पाश में जकड़े आगे बढऩे लगे। सावित्री ने फिर भी हार नहीं मानी तब यमराज ने कहा तुम वापस लौट जाओ तब सावित्री ने कहा मैं कैसे वापस लौट जाऊं। आपने ही मुझे सत्यवान से सौ यशस्वी पुत्र उत्पन्न करने का आशीर्वाद दिया है। तब यमराज ने सत्यवान के प्राण वापस लौटा दिए और जीवित कर दिया। उसके बाद सावित्री जब सत्यवान के शव के पास पहुंची तो कुछ ही देर में सत्यवान के शव में चेतना आ गई और सत्यवान जीवित हो गया उसके बाद सावित्री अपने को पति को पानी पिलाकर पुनः पानी पीकर अपना व्रत तोड़ा।

कष्ट मिट जाएंगे सत्यनारायण की कथा तो सुनिए

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