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वीरा

वीरा

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यह नाम मुझे निंदी ने दिया था। सच तो यह है कि जीवन में सच कभी-कभी कहानियों की तरह घट जाता है। ऐसे में उस सच्ची घटना के आगे सारी कहानियां झूठी लगने लगती हैं। निंदी मेरे बेटे का दोस्त था। पूरा नाम था नगेंद्र सिंह… छोटा था तो बड़ा प्यारा लगता था। नीली निक्कर ,सफेद शर्ट और सिर पर बंधे जूड़े में भी सफेद रूमाल। मैं अपने बेटे को लेने स्कूल जाती अक्सर वे दोनों उस लंबे चौड़े प्लेग्राउंड में एक छोर से दूसरे छोर तक भागते दिखाई देते। एक दिन मैं वहां गई तो निंदी को अकेले अपनी ओर अकेले आते देख हैरान रह गई।
-आज अकेले क्यों हो … तुम्हारा दोस्त कहां है? मैंने पूछा।
-उधर खेल रहा है… मैं नहीं गया। मुझे भूख लगी है, उसके कोमल चेहरे पर उदासी छा गई।
-लंच नहीं लाए.. मैंने उसे अपने करीब कर लिया।
-नहीं, मम्मी बीमार थी और पापा जी गुस्से में थे। जब भी पापा गुस्से होते हैं मम्मी रोया करती हैं फिर हम लंच नहीं लाते।
वह सनी से बस एक साल बड़ा था पर उसकी आंखों में आंसू देख मेरा दिल दहल गया। मैंने उसका हाथ थामा और कैंटीन में चली गई। मैंने उसके लिए लंच का आर्डर दिया । हम दोनों वहां बड़ी देर तक बैठे रहे। जब तक सनी आया निंदी मेरा बहुत प्यारा दोस्त बन चुका था। मैंने निंदी की मां को कभी नहीं देखा,पर कह सकती हूं कि वे खूबसूरत रही होंगी क्योंकि निंदी बहुत खूबसूरत था। निंदी की मां बीमार रहती थीं इसलिए उसके पापा ही उसे लेने आते थे,पर निंदी की सूरत उनसे बिल्कुल न मिलती थी। उसदिन के बाद मैंने सनी को डबल लंच देना शुरू कर दिया, ताकी वह निंदी के साथ लंच लेकर ही खेलने जाया करे।
वक्त बड़ी तेजी से गुजरा निदी और सनी बड़े होते गए। स्कूल में जब भी कोई फंक्शन होता तो निंदी और सनी की जोड़ी जरूर स्टेज पर रही। यों ही एकदिन पता चला कि निंदी की मां नहीं रहीं। तब उसकी उम्र सिर्फ बारह साल की थी। उसदिन बड़ी मुश्किल से उसे समजा पाई थी कि उसकी मां चली गई है कभी न आने के लिए और अब उसे जिंदा रहना है अकेले। सख्त जमीन पर पांव रखने हैं वो भी बिना किसी सहारे के। कितना अजीब लगता है, जब अचानक ही किसी बच्चे को पता चले कि अब वह जितनी दूर देखेगा बस वीरानियां ही वीरानियां होंगी। ममता का स्नेह का कोई दरख्त नहीं …कोई छांव नहीं।
वह थोड़ी देर खामोश रहा फिर मेरी तरफ देख कर धीमे से बोला था -पर वीरा अगले महीने मेरा जन्मदिन है, मां के बिना कौन करेगा ?
-हम सब मिलकर मनाएंगे इसी घर में …मैंने उसे बाहों में ले लिया, पर एक बात बताइए आप ने मुझे वीरा क्यों कहा…?
-मुझे अच्छा लगता है…उसने झेंपकर कहा और हंस दिया। हमने उसका जन्मदिन खूब धूमधाम से मनाया। जब निंदी के पापा उसे लेने आए तो वह अपने उपहारों के बीच सोया हुआ था।
पर यह सब बहुत दिनों तक नहीं चला। निंदी के पापा चाहते थे कि वह घर पर रहे पर स्कूल के बाद निंदी का अता-पता न होता। फिर निंदी के ऊपर सख्तियां होने लगीं। वह मुर्गियां दड़बे से निकाल कर भगा देता … स्कूल बंक करना और सारा दिन गली-गली फिरना जैसे उसकी आदत हो गई थी। धीरे-धीरे वह सबकी नजर से गिरता चला गया। पापा ,टीचर्स और प्रिंसिपल की नजर से यहां तक कि उसके पड़ोसी भी अब उसे हिकारत से देखने लगे थे। शिकायतें मेरे तक आती थीं ,पर मैं उसे ढूंढ पाती तब न। आखिर पंद्रह की उम्र में पहुंच गया निंदी बच्चा तो नहीं रह गया था।
एक दिन बाजार से लौटने पर मैंने देखा कि वह ड्राइंरूम में बैठा सनी से बात कर रहा था। मैंने सनी से कहा कि वह निंदी को मेरे पास भेज दे। वह आया और मेरे सामने कुर्सी पर बैठ गया।
-क्या है वीरा…? उसने सवालिया नजरों से मुझे देखा।
-निंदी बहुत सारी शिकायतें हैं तुम्हारी। तुम क्लास में पढ़ाई में सबसे पीछे हो …पिछले टैस्ट में तुम सारे सब्जैक्ट्स में फेल थे, और अपनी क्लास की एक लड़की को तुमने सीढ़ियों से नीचे गिरा दिया था।
-पर वीरा आपको ये बातें किसने कहीं…
-मत भूलो कि तुम्हारी प्रिंसिपल स्टैला मेरी दोस्त है।
-झूठ बोलती है साली…उसका चेहरा तमतमा आया।
– तो अब तुम गाली भी दे रहे हो ?
वह थोड़ी देर चुप रहा। एक धुंधली सी छाया उसके चेहरे पर आकर लौट गई। फिर धीरे से उसने आंखें उठाईं।
-वीरा मैं जानता हूं सारी दुनिया मेरी दुश्मन है …पर क्या तुम भी…? उसका गला भर आया।
पर निंदी तुझे कुछ बनना भी है या नहीं या यों ही वक्त गुजार देगा आवारों की तरह… मैंने उसका सिर अपने कंधे से लगा लिया। आखिर बच्चा ही तो था … इस उम्र में अकेला रह गया बच्चा कैसे उलझ-उलझ कर जिएगा कोई भी सोच सकता है। अचानक निंदी के आंसू फिसलकर मेरी पीठ पर गिरे और मैं चौंक गई। थोड़ी देर तक मुझसे कुछ बोला नहीं गया मैं उसे वैसे ही बाहों में समेटे रह गई। उसका सारा विद्रोह एक झटके में पिघल गया। सिर उठा कर उसने वैसे ही आशा और विश्वास से मुझे देखा जैसे बचपन में देखा करता था।
-वीरा…तेरी सौगंध, आज के बाद तेरे पास मेरी कोई शिकायत नहीं आएगी। उसने कहा और उठकर बाहर चला गया।
मुझे खुशी है कि निंदी ने अपनी बात रखी, बल्कि इधर तो वह इतना चुप-सा रहने लगा था कि मैंने ही उसे छेड़ते हुए कहा था।
– निंदी तू किसी से मुहब्बत तो नहीं करने लगा आखिर इतना खामोश क्यों रहता है ? बदले में निंदी के चेहरे पर बड़ी प्यारी सी मुस्कुराहट आकर फैल गई थी।


मैं अपने जीवन के कुछ सालों को अंधेरे की शक्ल में देखती हूं। मेरी शादी बहुत कम उम्र में हुई थी और रोशनी के साल वे ठहरते हैं जो मेरे विवाह से पहले के थे। बाद के सालों में एक गहरा अंधेरा मेरी उम्र को चढ़ता गया। घर की सारी जिम्मेदारियां जैसे मेरे ही नाम लिख दी गई थीं। और बदले में मुझे क्या मिला…कुछ नहीं। आप इसे भावनाओं का एक्सप्लायटेशन कह सकते हैं पर मैंने इसे अंधेरा कहा है। सो अंधेरे में रहते-रहते जैसे मुझे सूरज देखने की आदत ही छूट गई। पर उम्र के तैंतीसवें साल में जब मेरा सनी सोलह साल का हुआ तब मुहब्बत जैसा लफ्ज मेरी जिंदगी में दबे पांव दाखिल हो गया।
इस शब्द से सचमुच कभी मेरा कोई नाता न रहा था, पर हादसे तो कहकर नहीं आते। जहां तक ह्यूमन साइकालोजी का सवाल है तो किशोर उम्र के प्यार और मेच्योर प्यार में कोई फर्क नहीं होता। बल्कि मेच्योर प्यार ज्यादा संवेदन शील होता है…जरा से झटके से टूट कर बिखर जाने वाला। एक ओर उसे समाज का भी डर है और उपनी बदनामियों का भी। अपने कर्तव्यों का भी खयाल है और दूसरी तरफ अपनी अच्छी -खासी प्रतिष्ठा के रंग उतर जाने की भी दहशत है
जरा सोचिए कैसी हालत आपके मन की होती है, जब आपका बेटा जवान हो रहा हो और आप उसकी आंखों में झांक कर तसल्ली नहीं दे पाते कि अगर आप किसी से प्यार करते हैं तो आप ने गलत नहीं किया है। हम सिर्फ दो या तीन बार मिले होंगे कि बात बाहर आ गई। फिर वह सबकुछ गुजर गया मेरे साथ जो ऐसी किसी भी घटना का परिणाम हो सकता है। पर सच कहूं तो मैंने जिससे भी सच्ची मुहब्बत की, मुझे मिली बदनामियां, अप्रतिष्ठा का दौर और यातनाओं के टूटने वाले पहाड़ भी मेरे दिल से उसकी मुहब्बत न निकाल पाए। अपमान के दौर से गुजरती मैं अपने कमरे में ही कैद होकर रह गई। पूरे परिवार की निगाहों में मेरा चेहरा गुनाहों की तस्वीर बन कर रह गया था। शायद यह बात निंदी के कानों तक भी पहुंची होगी, पर काफी दिनों से मेरी उससे मुलाकात ही नहीं हुई थी।
उस रात मैं घर में अकेली थी सनी अपने पापा के साथ बाहर गया था। अचानक निंदी आंधी-तूफान की तरह मेरे कमरे में आ गया।
-वीरा …लोग तेरे बारे में क्या-क्या कहने लगे हैं पता है तुझे…?
-मालूम है… मैंने ठंडे स्वर में उत्तर दिया।
-अगर यह सच नहीं है तो मैं एक-एक को देख लूंगा।
-पर यह सच है निंदी।
-तू वीरा… तू… अचानक उसकी आंखों में घृणा उतरती चली गई।
-यह पूछने का कोई हक नहीं है तुम्हें …मैं तुम्हारी मां नहीं हूं और अब अगर एक शब्द भी कहा तो थप्पड़ रसीद कर दूंगी। अब तुम जा सकते हो ..समझ लेना वीरा मर गई तुम्हारे लिए। कह कर मैंने मुंह फेर लिया था। वह कुछ देर तक तो सकते की-सी हालत में खड़ा रहा, फिर चुपचाप उठ कर चला गया। मेरी आंखों में पानी ही पानी था। कैसा होता है यह रिश्ता जो सारे रिश्तों से ऊपर चला जाता है।
हालात बदले और कुछ ज्यादा ही बिगड़ गए। वह चौरासी के दंगों का वक्त था। छिटपुट घटनाएं हमारे शहर में भी होने लगी थीं। फिर ऐसा लगा जैसे सारा शहर ही जलने लगा हो। निंदी के पापा अपनी सुरक्षा का यकीन न कर पाए और उसे लेकर शहर छोड़ गए। जाते वक्त मुझसे मिलकर भी न गया निंदी …पर जितना बड़ा गम अनजाने ही मुझे मिल गया था उसके आगे ये सारी बातें छोटी हो गई थीं।
दिन सूखे पत्तों की तरह झरते चले गए, पर दो साल बाद किसी सतरंगे पक्षी की तरह निंदी का खत इस चुप्पी की मुंडेर पर आ बैठा।
वीरा…
चला तो आया मैं तुझे छोड़ कर। जानता हूं तू अब भी मेरे से नाराज होगी, पर उस दिन उतने पर ही बस नहीं किया था। मैंने उसके बारे में पूरा पता किया था … तब तक वह शहर छोड़कर जा चुका था। बड़ी देर तक सोचा तो मेरा मन भर आया। मेरी वीरा का दिल तो बहुत बड़ा है …याद है तुझे मेरे लिए भी कितने ताने सुनने पड़ते थे, पर तूने कभी भी मुझे अपने से अलग नहीं किया। मां की जगह तो मैंने तुझे ही पाया है वीरा। सोचा है एक बार उस आदमी को जरूर देखूंगा, जिसकी वजह से मिला अपमान का कीचड़ तूने अपने माथे पर चंदन की तरह लगा लिया है। जरूर वह कोई अनोखा ही होगा या तेरे निंदी की तरह अकेला। एक बार तूने मुझसे पूछा था …निंदी तू किसी से प्यार तो नहीं करने लगा ? आज कहता हूं जरूर करूंगा ,पर जब मुझे अपनी वीरा जैसी कोई मिलेगी तब, नहीं तो किसी से भी शादी कर सुबह-शाम का खाना वसूल लूंगा, पर जिस सूरज की रोशनी में तूने दुबारा अपना चेहरा देखा है, अपने मन में उसकी रोशनी कम न होने देना। कौन जाने उसका भी दिल अकेला हो तेरे निंदी की तरह जिसका अब भी दूर-दूर तक कोई नहीं है।
निंदी का खत मेरे हाथों में दो साल बाद आया। इन दो सालों में मैंने अपने आपको पत्थर बना लिया था, पर उस दिन मैं अपने आंसू नहीं रोक पाई। लगा जैसे अभी भी सब कुछ नहीं खोया है एक छोटा सा कोमल तंतु बचा रह गया है। मेरी आंखों के आगे निंदी का चेहरा तैर गया जिसके लिए अबतक वीरा वैसी ही थी जैसी पहले थी ..स्नेह और ममता से परिपूर्ण।

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