गुम हो गई खातरियां

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मंडी। खातरियों से हिमाचल प्रदेश के अधिकतर लोग परिचित तो होंगे ही। प्रदेश के चंगर इलाके में जल संग्रहण का एक जमाने में सबसे बेहतरीन माध्यम था। चंगर इलाके में पानी की समस्या से पार पाने के लिए बुजुर्गों ने एक नायाब तरीका खोजा था और उसे नाम दिया गया था खातरी। लोग अपने घर के पास मौजूद छोटी-बड़ी पहाड़ी के निचले हिस्से पर छेनी और हथौड़े की मदद से एक गड्ढा खोदते थे जिसे खातरी कहा जाता है। यह खातरी कई फीट लंबी और गहरी होती थी। इसे बनाने में वर्षों लग जाते थे क्योंकि इसका निर्माण कार्य काफी बारिकी से करना पड़ता था। जब यह खातरी बनकर तैयार हो जाती थी तो इसमें वर्षा जल का संग्रहण किया जाता था। बारिश जब होती थी तो उस पहाड़ी पर गिरा पानी पूरी तरह से छनकर इस खातरी में जमा होता जाता था। बरसात के मौसम में जल संग्रहण के बाद इसका वर्ष भर इस्तेमाल किया जाता था।

इस क्षेत्र में पानी की समस्या इतनी विकराल होती थी कि जिस व्यक्ति ने अपने घर के पास खातरी बनाई होती थी वह उसमें ताला लगाकर रखता था। क्योंकि उन दिनों आभूषणों से ज्यादा डर पानी की चोरी का रहता था। गांव में यदि किसी के घर कोई शादी समारोह हो तो उसे जरूरत के हिसाब से पानी दिया जाता था। लेकिन के दौर में आज मिटने की कगार पर पहुंच चुका है। लेकिन आईपीएच विभाग ने अब इसे पुर्नजीवित करने का बीड़ा उठाया है।

भविष्य में जल संकट विश्व के सामने सबसे बड़े संकट के रूप में उभरने वाला है। ऐसे में इस प्रकार के जल स्त्रोत अपनी अहम भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए इनका संरक्षण जरूरी है ताकि भविष्य के संकट से पार पाने की अभी से तैयारी की जा सके।

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