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वीरभद्र समर्थक विधायक बोले,सुक्खू को निष्क्रिय कार्यशैली के चलते पद से हटाया

आशा सहित 11 विधायकों ने राहुल गांधी के फैसले का समर्थन व स्वागत किया 

वीरभद्र समर्थक विधायक बोले,सुक्खू को निष्क्रिय कार्यशैली के चलते पद से हटाया

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शिमला। पूर्व सीएम वीरभद्र सिंह व कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुखविंदर सिंह सुक्खू की जंग में विधायक भी कूद पड़े हैं। अब 11 कांग्रेसी विधायकों ने पूर्व सीएम वीरभद्र सिंह पर बयानबाजी करने को लेकर सुक्खू को घेरा है। विधायक आशा कुमारी, धनीराम शांडिल, आईडी लखनपाल,  नंद लाल, जगत सिंह नेगी,  राजेंद्र राणा, मोहन लाल ब्राक्टा, विक्रमादित्य सिंह, विनय कुमार, आशीष बुटेल  व पवन काजल का कहना है कि सुखविंदर सिंह सुक्खू पिछले छह सालों से प्रदेश के कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में कार्य कर रहे थे और उनकी निष्क्रिय कार्यशैली को ध्यान में रखते हुए व लोकसभा के चुनावों के दृष्टिगत उनकी जगह नए अध्यक्ष को बनाने का निर्णय पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने लिया, जिसका हम समर्थन व स्वागत करते हैं ।

वीरभद्र सिंह के बारे में की गई टिप्पणियां निंदनीय

उन्होंने कहा कि पिछले कल पूर्व कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष सुखविंदर सिंह सुक्खू द्वारा जो टिप्पणियां वीरभद्र सिंह के बारे में की गई हैं, वह न केवल निंदनीय ही हैं, अपितु ये इनके कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष के पद को गंवाने पर बौखलाहट और बीमार मानसिकता को दर्शाने वाला कदम है। वीरभद्र सिंह न केवल हिमाचल प्रदेश कांग्रेस बल्कि पूरे भारत में वरिष्ठतम नेताओं में से एक हैं, जिन्होंने पंडित जवाहर लाल नेहरू से लेकर डॉ. मनमोहन सिंह तक के भारत के पीएम के साथ प्रशसनीय एवं देश व प्रदेश को उन्नति के पग पर ले जाने वाला कार्य किया है।
इसके अतिरिक्त वह हिमाचल प्रदेश के 6 बार सीएम, कई बार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष व केंद्रीय मंत्री के रूप में भी भारत के लोगों की सेवा कर चुके हैं। सुक्खू  द्वारा दिया बयान न केवल वीरभद्र सिंह को अपमानित करता है, अपितु कांग्रेस पार्टी व प्रदेश के लोगों को भी अपमानित करने वाला है। उनका यह बयान कि पिछले विधान सभा चुनाव में हार की जिम्मेवदारी सरकार की है, संगठन की नहीं हास्यस्पद और बचकाना है। क्योंकि पार्टी अध्यक्ष होने के नाते यह दायित्व पार्टी का था और अपनी नैतिक जिम्मेदारी को दूसरे पर डालना किसी भी तरह उचित नहीं हैं और होना तो यह चाहिए था कि दोष दूसरों के सिर मढ़ने के बजाए वह हार की जिम्मेदारी को अपने उपर लेते हुए पार्टी अध्यक्ष पद से खुद ही त्यागपत्र दे देते।

सुक्खू ने विस चुनाव में जिन्हें दिया टिकट, वह जमानत भी बचा नहीं पाए

विधायक आशा कुमारी, धनीराम शांडिल, आईडी लखनपाल,  नंद लाल, जगत सिंह नेगी,  राजेंद्र राणा, मोहन लाल ब्राक्टा, विक्रमादित्य सिंह, विनय कुमार, आशीष बुटेल  व पवन काजल ने कहा कि पिछले विधानसभा चुनाव में सुक्खू ने पार्टी अध्यक्ष होने के नाते जिन-जिन नेताओं को कांग्रेस टिकट दिए, उनमें ज्यादातर नेता अपनी जमानत तक नहीं बचा पाए। अच्छा होता यदि सुक्खू इस तरह की बयानबाजी न करके बीजेपी के शीर्ष नेताओं व केंद्रीय सरकार की जन विरोधी नीतियों का विरोध करते और आम लोगों के हित में आवाज उठाते। जहां तक उनका यह बयान कि वीरभद्र सिंह ने केंद्रीय नेतृत्व को गुमराह किया, यह भी हास्यस्पद है, क्योंकि 6 बार सीएम बनना व इतने लंबे समय तक प्रदेश की राजनीति में छाए रहना प्रदेष की जनता के समर्थन के साथ बिना केंद्रीय नेतृत्व के पूर्ण सहयोग व आशीर्वाद के बिना संभन नहीं है।

विधायकों की इच्छा के विरूद्ध सुक्खू ने कीं नियुक्तियां

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सुक्खू द्वारा विधान सभा क्षेत्रों में स्थापित नेताओं को डीस्टेबलाइज करने के लिए कांग्रेस पार्टी में कई नियुक्तियां स्थानीय विधायकों की इच्छा के विरूद्ध कीं, ताकि वह सुक्खू का गुणगान अपने-अपने विधानसभा क्षेत्रों में कर सकें। हाल ही में नगर निगम शिमला की हार का ठीकरा भी सरकार पर फोड़ना गलत और तथ्यों से हट कर है। क्योंकि उसमें भी पार्टी अध्यक्ष के ढुलमुल रवैया रहा, क्योंकि अंतिम घड़ी तक कोई उम्मीदवार नहीं चुने। कभी कहा कि चुनाव पार्टी निशान पर हों, तो कभी कहा कि जो जितेंगे उसे पार्टी में शामिल कर लेंगे। इस तरह की सोच ने कांग्रेस पार्टी को बहुत नुकसान पहुंचाया, जिसकी जिम्मेदारी सुक्खू को लेनी चाहिए ।

सुक्खू से आग्रह, गुटबाजी को नजरअंदाज कर एकजुट हो जाएं

उनका यह बयान भी हास्यस्पद और तथ्यों से परे है कि वीरभद्र सिंह प्रदेश में पार्टी अध्यक्ष के हमेशा खिलाफत करते रहे हैं। वीरभद्र ने सभी नेताओं को व प्रदेश के लोगों को हमेशा सम्मान दिया, जिसका परिणाम हम सभी के सामने है। परन्तु पार्टी हित में वह किसी के विरूद्ध भी आरोप लगाने से हिचकचाए नहीं, उनका सुक्खू से कोई व्यक्तिगत भेदभाव नहीं है। उन्होंने सुखविंदर सिंह सुक्खू से निवेदन किया है कि कांग्रेस पार्टी को आगामी लोक सभा चुनाव में विजयी बनाने के लिए आपसी गुटबाजी को नजरअंदाज करते हुए एकजुट हो जाएं और मिलकर सरकार की नाकामियों को लोगों तक ले जाएं। इसके लिए वीरभद्र सिंह जैसे कदावार नेता का पार्टी के साथ होना जरूरी है। वीरभद्र की हमें आवश्यकता नहीं है, यह बयान तो सारी सीमाएं लांघने वाला है, क्योंकि उनके पास इस बयान को देने का अधिकार ही नहीं रह गया, क्योंकि वह अब एक कांग्रेस के आम कार्यकर्ता हैं, अध्यक्ष नहीं।

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