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मेरे साथ चलोगी ?

मेरे साथ चलोगी ?

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टेलीविज़न पर मुंबई और दिल्ली दोनों ही शहर पानी से सराबोर होते दिखाई दे रहे थे। पानी सड़कों पर इस तरह भरा था कि किसी बरसाती नदी का भ्रम होता था। उस पानी में आदमी चलते दिखाई दे रहे थे और बतखें भी, बतखों के बगल में कारें चल रही थीं।
तो महानगरों में बारिश हो रही थी और पहाड़ सूखे थे.. उमस-गर्मी से लोग बेहाल थे। किसान-बागबान परेशान थे-बारिश न हुई तो क्या होगा ?
वह एक लोकल अख़बार का दफ्तर था जहां वीथिका काम करती थी। उसके विभाग में कुल चार लोग थे जीनिया मैगजीन बनाती थी, अभय एडिट पेज बनाता था, समीर रेफरेंस इंचार्ज था और वह खुद। ये सारे काम वीथिका की देख-रेख में होते थे।
वीथिका के सामने आए हुए लेखों का ढेर था। बेरोजगारी, रेन हार्वेस्टिंग के तरीके, पेय जल की परेशानियां और भ्रष्टाचार।
उसने सामने रखे लेखों को करीने से फाइल में लगाया, उस दिन का जाने वाला मैटर बाहर रखा फिर छत की ओर देखने लगी। पंखा चल तो रहा था पर हवा जैसे ऊपर से ही गायब हो जाती थी।
थोड़ी ही देर हुई होगी कि बाहर की चिलचिलाती धूप अचानक गायब हो गई और सारा आकाश बादलों से ढक गया। बारिश इतनी तेजी से आई कि सभी हैरान रह गए। अभय ने उठ कर लम्बी-चौड़ी खिड़की का पर्दा एक तरफ कर दिया।
सामने सचमुच बरसात थी। आख़िरकार मानसून आ ही गया था।
बारिश को देख जीनिया कैंटीन में चाय का ऑर्डर दे आई।
– वीथिका मैम , मौसम सुहाना है और मेरे पास एक लड़की का आर्टिकल आया है , उसने अपनी तस्वीर भी भेजी है। खूबसूरत है, अभय शरारत से हंसा।
जितनी भी लेखिकाएं हैं तुम सब के लिए ऐसा ही कहते हो, जीनिया हंस पड़ी।
– क्या करूं मेरा दिल जरा जल्दी फिसल जाता है कहता अभय फाइल ले कर उठ खड़ा हुआ।
समीर इन दोनों की नोक-झोंक से तटस्थ लाइब्रेरी की किताबें दर्ज कर रहा था।
वीथिका के होंठों पर थमी हुई हंसी थी। वह सोच रही थी कि अब शायद नलों में पानी आ जायेगा सड़कों पर गड्ढे तो होंगे पर उनमें भरा पानी देख कर किसी को चिढ़ नहीं लगेगी।
अख़बार का दफ्तर बड़ा बेबाक माहौल रखता है। यहां संवेदनाएं जैसे शून्य हो जाती हैं। पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण दुर्घटनाएं आम हैं , पर हैरानी प्रतिक्रिया सुन कर होती है।
-कहां गिरी है बस ?
-वो तो ठीक है पर कैजुएलिटी कितनी है ?
यानी अगर ज्यादा लोग मरे हैं तो बड़ी खबर है वरना … .
वीथिका का ध्यान बार-बार भटक जाता है , उसके पर्स में आज की डाक से आया एक छोटा सा खत है , सिर्फ एक लाइन का – मेरे साथ चलोगी ?
खत कार्तिकेय का है वीथिका चकित है , जबसे मोबाइल का जमाना आया है लोगों ने खत लिखना बंद कर दिया है , यह स्लिप जैसा खत कितने दिनों बाद उसके सामने आया है , वह भी एक सवाल के साथ।
कार्तिकेय उसे किसी समारोह की कवरेज के वक्त मिला था। वह दूसरे अख़बार का ब्यूरो था , तब उससे बड़ी फॉर्मल सी बात हुई थी। हां वीथिका को यह पता था कि पलक झपकते ही उसकी लाइफ हिस्ट्री कार्तिकेय के पास आ गयी होगी.. उस दिन वह नीले सूट में खूबसूरत लग रहा था। उसका नाम काफी मशहूर था और नए पत्रकार उसे रोल मॉडल की तरह लेते थे। इस बात को तीन महीने गुजर चुके थे।
दूसरे दिन सुबह से ही हल्की बारिश शुरू हो गयी। वीथिका ने छतरी ली और घर से बाहर आ गई। दफ्तर उसके घर से एक किलोमीटर की दूरी पर था। यह रास्ता वह पैदल ही तय करती थी … सड़क भीगी थी., झीनी बारिश ने मौसम खुशनुमा कर दिया था। उसने छतरी नहीं खोली और उसी रिमझिम में चलती गयी। अचानक एक गाड़ी उसके पास आकर रुकी।
-आ जाओ मैं उसी तरफ जा रहा हूं, तुम्हे छोड़ दूंगा, खिड़की का शीशा नीचे करते हुए कार्तिकेय ने कहा ।
-नो थैंक्स सर, ऐसे मौसम में मुझे पैदल चलना अच्छा लगता है।
-क्या सिरफिरी लड़की है, उसने साथ बैठे पत्रकार से कहा था। गाड़ी आगे चली गई थी ……..
सुन कर वीथिका के होठों पर हंसी दौड़ गई। सोच रहा होगा, कहां तो जूनियर लड़कियां उसके साथ बैठना सौभाग्य समझती हैं और कहां यह…
वीथिका भी क्या करे, व्यस्तता ने उसे उबार तो लिया था , पर अतीत को भूलना इतना आसान भी नहीं था। पति से अलग हुए उसे पांच साल हो गए थे। इन सालों में उदासी जैसे उसकी सहेली बन गयी थी। उस पर कार्तिकेय का यह खत, मेरे साथ चलोगी?
क्या वाहियात सवाल है। ऐसे कोई किसी के साथ चल सकता है क्या?
वे नवरात्रों के दिन थे , वीथिका मंदिर गयी तो लौटते वक़्त सीढ़ियों के पास ही कार्तिकेय मिल गया।
-आप यहां कैसे? वीथिका ने आश्यर्य से पूछा था।
-जरा आँखें उठा कर देखने का कष्ट करो, मैं मंदिर से नहीं, मिशन हॉस्पिटल से आ रहा हूँ। ये सीढ़ियां वहां तक जाती हैं। मेरे एक दोस्त के यहां बेटी हुई है उसे ही देखने गया था।
वीथिका चुप हो गई। बाकी सीढ़ियां वे साथ ही उतरे. . .
-एक बात बताओ, मैंने तुम्हे चर्च जाते देखा है , गुरुद्वारों और दरगाहों में भी तुम्हारे जाने के स्पष्ट प्रमाण हैं मेरे पास और मंदिरों के चक्कर तो तुम लगाती ही रहती हो. . तुम्हारा वास्तविक धर्म क्या है?
– है न , इंसानियत का। वीथिका हंस दी। इन सारी जगहों में मैं धर्म के लिए नहीं जाती ये जगहें मुझे अच्छी लगती हैं। गुरूद्वारे से उठते गुरुबाणी के स्वर, मंदिरों के परिसर में शाम को झिलमिल करते दीप और दरगाहों में सन्नाटे के बीच अकेला जलता दीया ये सभी मेरे लिए आकर्षण हैं।
-कमाल है, मैंने कभी इस बात को इस नजरिये से नहीं देखा। वह अपलक उसे देख रहा था , उसे लग रहा था कि वह सचमुच वीथिका है अनजान जंगलों के बीच गुजरती किसी पगडंडी की तरह जिसे समझ पाना मुश्किल है. . वीथिका उसके हाथों में प्रसाद दे कर चली गयी।
उस रात जाने क्यों कार्तिकेय अनमना सा ही रहा। उसे लग रहा था कि खुद उसकी जिंदगी भी राहें बदल रही है और शायद उस पगडंडी की ओर मुड़ गई है जो जंगल की ओर जाती थी।
एक सप्ताह गुजर गया , पर वीथिका का मन जैसे हवा में उड़ा जाता था। इस बीच कई बार उसने खुद से सवाल किया था कि क्या वह कार्तिकेय को पसंद करने लगी है? दिल धीरे से हां में जवाब देता और वह चुप रह जाती। उम्र का पैंतीसवां साल और प्यार की ये खता,…
वीथिका कुदरत के इस खेल पर हैरान थी।
बारिश का मौसम गुजर गया , ठण्ड बड़ी तेजी से आई। लोगों ने गर्म कपड़े निकाल लिए।
इस बीच एक शहर का सौ साला जश्न मनाने की तैयारियां शुरू हो गईं और ऑफिस से कवरेज के लिए वीथिका को ही भेजा गया।
वह वहां एक दिन पहले पहुंची, उसके रुकने का इंतजाम रेस्ट हाउस में था। लोकेशन देख कर वह खिल गई। सूरज पहाड़ियों के पीछे जाने को तैयार था ,आसमान जैसे चित्रकार का कैनवास बन कर रह गया था.. लाल ,सुनहरी भूरी पट्टियां और पूरे आसमान में दौड़ लगाते बादलों के टुकड़े। रेस्ट हाउस में पहुंच कर उसने सामान एक ओर रखा। तसल्ली थी कि यह कॉर्नर रूम था और शोर नहीं के बराबर।
अचानक फोन बजा, उधर से अभय लाइन पर था।
– वीथिका मैम, कल रात दो पुल बह गए। आज खनन वाला आर्टिकल लगा लूं ?
-बेशक और सुनो, कुछ फैसले खुद भी ले लिया करो। क़म से कम तीन दिन के लिए मुझे बख़्श दो …. वीथिका ने हंस कर कहा।
-ठीक है, कह कर उसने फोन रख दिया।
वीथिका ने कुक को कॉफी के लिए कहा और तैयार होने लगी। थोड़ी देर बाद वह भीड़ भरे इलाके में थी। ठण्ड होने के बावजूद लोग घरों से बाहर थे। सड़क पर टहलते हुए लोग। पुरुष-औरतें और गर्म कपड़ों में खरगोशों कर तरह सजे डगमग चलते बच्चे। हाथों में हाथ लिए कितने ही जोड़े घूम रहे थे,… जवान-बुजुर्ग जोड़े। यह सब देख कर वीथिका का दिल उदास हो आया।
कैसे निभा लेते हैं लोग इतने सालों तक और इन्हे देख कर कितना अच्छा लगता है.. सारा शहर रोशनी से जगमगा रहा था वह मुग्ध सी देख रही थी। अचानक उसने कार्तिकेय को आते देखा।
-मैं जानता था यहां की कवरेज के लिए तुम्हें ही भेजा जाएगा।
-पहली बार वीथिका ने उसे इतने करीब से देखा।
डैशिंग पर्सनैलिटी , चौड़े कंधे, उसकी समर्थता की चमक उसके चेहरे पर थी। जहां वे खड़े थे, उसके नीचे नदी का तेज शोर था।
– इस नदी को देखो इसका बहाव कितना तेज है कार्तिकेय ने कहा।
-हमारे यहां की नदियां बेहद शांत होती हैं एकदम मंथर गति से बहती हैं।
-तुम्हारा घर नदी के किनारे था ?
-हां घाघरा मेरे घर के सामने से ही बहती है। कार्तिक के महीने में हम बांस की चटाइयों पर दीए जला कर प्रवाहित करते थे। रात के अंधेरे में चटाइयों पर झिलमिल करते दीप,… मां कहा करती थीं, इनसे हमारे पूर्वजों की राहें रोशन होती हैं,… कहते-कहते वीथिका का स्वर कहीं खो गया।
-घर की बहुत याद आती है ?
कार्तिक का स्नेहिल स्वर उसे कहीं गहरे छू गया।
याद करके भी क्या करना? वीथिका उदास थी। वे दोनों पोल लाइट के नीचे खड़े थे, इसलिए वहां रोशनी कम थी। थोड़ी ही देर बाद बर्फ़बारी शुरू हो गई। एकदम रुई के फाहे जैसी नर्म बर्फ। वीथिका ने कोट के साथ कैप भी पहन रखी थी , पर कार्तिकेय के बालों में बर्फ के कण चमकने लगे थे।
-शेड में चलते हैं आपका सिर खुला है ठंड लग जाएगी।
-नहीं लगती ,कितने दिनों बाद खुली हवा, बर्फ और ऐसा खूबसूरत मौसम मिला है।
-वीथिका मैं जिंदगी के आखिरी पल तक तुम्हारे साथ जीना चाहता हूं। ऐसा करते हैं हम शादी कर लेते हैं।
-मुझे विवाह संस्था में विश्वास नहीं।
-ठीक है, तुम मानो या न मानो पर सपने में मैं तुमसे विवाह कर चुका हूं और सारे किले भी फतह कर चुका।
-शट अप, वीथिका का चेहरा लाल हो आया।
-देखो मैं अपने अखंडित ब्रह्मचर्य का दावा तो नहीं करता , पर तुम्हारा वफादार रहूंगा इसका प्रॉमिस करता हूं। यह भी कि कभी तुम्हारी आँखों में मेरी वजह से आंसूं नहीं आएंगे।
वीथिका यह स्वीकारोक्ति सुनकर दूसरी तरफ मुंह फेर कर हंसने लगी। फिर उसने मुड़ कर उसे ध्यान से देखा उस फीकी रोशनी में वह किसी जिद्दी बच्चे जैसा ही लग रहा था।
एक पल के लिए उसने अपने जीवन के पिछले पांच साल के अंधेरे को देखा , फिर जिंदगी से भरपूर कार्तिकेय को। कौन पूछने वाला है अब जिंदगी का हिसाब ,… प्यार तो चाहिए क्योंकि प्यार खूबसूरत है …. अपीलिंग। उसने कार्तिकेय के चेहरे को हथेलियों के बीच घेर लिया।
-मेरे साथ चलोगी ,… ? कर्तिकेय ने सरगोशियों में कहा।
-कहां ,…? वह हंस दी।
-किसी ऐसी जगह जिसका हमें खुद पता न हो। वह उसे लिए आगे बढ़ गया।
उनके पैरों के नीचे बर्फ की कालीन थी। यह कोई बंधन नहीं सिर्फ प्यार था यह वीथिका जानती थी।

– प्रिया आनंद


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