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World Book Day : खुद भी पढ़ें किताबें, दूसरों को भी करें प्रेरित

World Book Day : खुद भी पढ़ें किताबें, दूसरों को भी करें प्रेरित

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कोरोना का दौर है। ऐसे में सभी घर पर रह रहे हैं औऱ इस दौर में आप का सच्चा साथी कोई है तो वह है एक किताब। आज विश्च पुस्तक दिवस है तो चलिए आज कोई पुस्तक पढ़े और अपने परिजनों को भी किताबें पढ़ने के लिए प्रेरित करें। बहुत सारे लोग है जो लॉकडाउन के दौरान किताबें पढ़कर अपने समय का सदुपयोग  रहे हैं। पुस्तकें अध्ययन की प्रवृत्ति, जिज्ञासु प्रवृत्ति, सहेजकर रखने की प्रवृत्ति और संस्कार रोपित करती हैं। पुस्तकें न सिर्फ ज्ञान देती हैं, बल्कि कला, संस्कृति, लोकजीवन, सभ्यता के बारे में भी बताती हैं। इंसान का सबसे अच्छा दोस्त अगर कोई है तो वह पुस्तक है। आज के समय इंटरनेट ने हमारे इस प्रिय दोस्त को हमसे दूर कर दिया है। इस समय का जो सबसे चिंतित करने वाला सवाल है वह यह कि लोग किताबों को हाथ भी नहीं लगाना चाहते । बच्चे हों या बड़े, वे अपनी हर खोज के लिए इंटरनेट को बेहतर समझते है। तो क्या लोगों की किताबें पढ़ने की दिलचस्पी खत्म हो गई है ? किताबें आज भी लिखी जा रही हैं ,प्रकाशित भी हो रही हैं।


World Book Dayपुस्तक मेले भी लग रहे हैं पर किताबों को पढ़ने वाले कितने हैं ? दरअसल कंप्यूटर और इंटरनेट की दुनिया ने सहज उपलब्धता देकर लोगों की किताबों में रुचि खत्म कर दी है। हाल यह है कि लोग अब किताबें कम खरीदते हैं। पाठक और पुस्तक के बीच की यही दूरी खत्म करने के लिए यूनेस्को ने पहली बार 23 अप्रैल 1995 को पुस्तक दिवस (World Book Day) का आयोजन किया धीरे-धीरे यह हर देश में व्यापक रूप से फैल गया। किताबें हमारे लिए महत्वपूर्ण हैं इसे एहसास कराने के लिए सरकार ने भी काफी कोशिशें की हैं।
स्कूलों में बच्चों को पढ़ाई की आदत डालने के लिए सस्ते दामों पर पुस्तकें बांटने जैसे अभियान चलाये जा रहे हैं। इसके अलावा सार्वजनिक स्थलों पर प्रदर्शनियां लगाकर पुस्तक पढ़ने के प्रति लोगों को जागरूक किया जा रहा है। स्कूली बच्चों के अलावा उन लोगों को भी पढ़ाई के लिए जागरूक किया जाना ज़रूरी है जो किसी कारणवश अपनी पढ़ाई छोड़ चुके हैं। बच्चों में विभिन्न जानकारियों व मनोरंजन से भरपूर पुस्तकों की प्रदर्शनी जैसे अभियान से पढ़ाई की संस्कृति विकसित की जा सकती है। पुस्तकालय इस संबंध में अहम् भूमिका निभा सकते हैं, बशर्ते उनका रख-रखाव सही ढ़ंग से हो और स्तरीय पुस्तकें और पत्र-पत्रिकाएं वहां उपलब्ध हों।

वैसे तो स्कूलों में लाइब्रेरी होती है। सवाल यह है कि वहां पर जाते कितने बच्चे हैं। कठिन सवालों के जवाब किताबों में खोजने के बजाय हम इंटरनेट पर उसे आसानी से खोजना चाहते हैं। पुस्तकों के प्रति ख़त्म हो रहे आकर्षण के प्रति इस दिशा में गंभीरता से सार्थक कदम उठाने की ज़रूरत है। इसके चलते लोगों में जिज्ञासु प्रवृत्ति और याद करने की क्षमता भी ख़त्म होती जा रही है। बच्चों के लिए तो यह विशेष समस्या है और इस पर तुरत ध्यान देने की आवश्यकता है। इस बार प्रण लें कि खुद तो किताबें पढ़ें पर दूसरों को भी प्रेरित करें।

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