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उपभोक्ता संरक्षण दिवस : कितने जागरूक हैं आप

उपभोक्ता संरक्षण दिवस : कितने जागरूक हैं आप

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World Consumer Rights Day: हम सभी उपभोक्ता की श्रेणी में आते हैं। उपभोक्ता वह है जो अपने लिए वस्तुओं को खरीदता है। इनमें दैनिक उपयोग तथा स्थायी उपयोग की वस्तुएं शामिल हैं। सेवाओं में यातायात, बिजली तथा अन्य सेवाएं हैं जिन्हें हम अन्य स्रोतों से प्राप्त करते हैं। वस्तुओं के उपभोक्ता और सेवाओं के उपभोक्ता होने में थोड़ा फर्क है। हम प्रतिदिन परिवहन, कार्यालय अथवा घर में बिजली या टेलीफोन तथा टीवी आदि का उपयोग करते हैं। यह सेवा की श्रेणी में आता है।


World Consumer Rights Dayहम कोई वस्तु खरीदते हैं तो उसकी परख कर सकते हैं कि वह सही है या नहीं, पर सेवाओं की विश्वसनीयता और निरंतरता की बात पक्के तौर पर नहीं कही जा सकती। कुछ वस्तुओं को हम खरीदते हैं और उनका उपयोग तुरंत कर डालते हैं या कुछ समय बाद भी। जैसे कि अनाज को हफ्तों, महीनों तक रख सकते हैं। फ्रिज भी आवश्यक मरम्मत करवाते रहने पर कई साल तक चल जाता है। हां, परिवहन सेवा, बिजली आपूर्ति अथवा टेलीफोन सेवा के बारे में ऐसा नहीं कर सकते। हालांकि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत हमें यह अधिकार प्राप्त है कि बैंकिंग, बीमा, वित्त, ट्रांसपोर्ट, होटल, टेलीफोन आवास आदि में कोई भी उपभोक्ता संरक्षण प्राप्त कर सकता है, पर स्थितियां उपभोक्ता के विपरीत हैं।

बाजार में गुमराह करने वाले विज्ञापन चलते रहते हैं। उन्हीं के तहत आकर्षित होने वाले उप भोक्ताओं को घटिया वस्तुएं और सेवाएं सौंप दी जाती हैं। इन हालातों में उपभोक्ता के अधिकारों की रक्षा करना सरकार और सार्वजनिक संस्थाओं के लिए चिंता का विषय बन गया है। चयन का अधिकार उपभोक्ता के पास है। ऐसी वस्तुओं से सुरक्षा का भी अधिकार उसके पास है जिनसे स्वास्थ्य और जीवन की हानि हो सकती है। अगर पूरी सतर्कता बरतने के बाद भी हानि होती है तो आप विक्रेता को उत्तरदायी ठहरा सकते हैं। इसमें मूल्यवापसी और क्षतिपूर्ति का भी अधिकार है। फिलहाल तो उपभोक्ता स्वयं भी सावधान रहें कोई भी सामान लें उसका कैशमीमो जरूर लें गारंटी कार्ड भी संभाल कर रखें।

विज्ञापन के जरिए व्यापारी अपने उत्पाद के स्थायित्व और गुणवत्ता के झूठे दावे करते हैं और सही सूचना के अभाव में उपभोक्ता शोषण का शिकार होता है। दर असल उपभोक्ता मात्र भेड़ों का एक झुंड बन कर रह गया है जो सिर्फ अनुकरण करता है। सच्चाई यह है कि राशन, इलाज और शिक्षा जैसी मूलभूत आवश्यकताओं के लिए उसे लंबी लाइनों में खड़ा होना पड़ता है। ऐसे में उपभोक्ता को सार्वभौमिकता कोरी कल्पना ही लगती है। उपभोक्ता के जीवन का एक लंबा भाग इन समस्याओं से संघर्ष करने में निकल जाता है। जाहिर है कि नियम कानून बनने के बाद भी उपभोक्ता शोषित है न कि संरक्षित है।

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