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शनि जयंती : ॐ ऐं ह्लीं श्रीशनैश्चराय नम:

शनि जयंती :  ॐ ऐं ह्लीं श्रीशनैश्चराय नम:

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शनि की साढ़ेसाती उन संत-महात्माओं को भी प्रताड़ित करती है,जो योग के साथ भोग को अपनाने लगते हैं। हर मनुष्य को तीस साल में एक बार साढ़ेसाती अवश्य आती है, यदि यह साढ़ेसाती धनु, मीन, मकर, कुम्भ राशि में होती है, तो कम पीड़ाजनक होती है। फिलहाल कोई नया काम, नया उद्योग, साढ़ेसाती में नहीं शुरू करना चाहिए। कोई वाहन  भी इस समय में नहीं खरीदना चाहिये, शनिदेव सूर्य पुत्र हैं। उनके शरीर की कांति नीलमणि जैसी है। उनका वाहन काग है, हाथ में धनुष बाण हैं, एक हाथ से वर मुद्रा भी है। वैसे शनि ग्रह के सम्बन्ध में अनेक भ्रान्तियां भी हैं इसलिये उसे मारक और अशुभ माना जाता है। परंतु सत्य यह है कि शनि देव प्रकृति में संतुलन पैदा करते हैं, और हर प्राणी के साथ उचित न्याय करते हैं। जो लोग अनुचित कार्य को आश्रय देते हैं, शनि केवल उन्हीं को दंडित करते हैं।
धर्मग्रंथों के अनुसार सूर्य पत्नी संज्ञा की छाया के गर्भ से शनि देव का जन्म हुआ, जब शनि देव छाया के गर्भ में थे तब छाया भगवान शंकर की भक्ति में इतनी ध्यान मग्न थी कि उसे अपने खाने पीने तक की सुध नहीं थी जिसका प्रभाव उसके पुत्र पर पड़ा और उसका वर्ण श्याम हो गया। शनि के श्यामवर्ण को देखकर सूर्य ने अपनी पत्नी छाया पर आरोप लगाया कि शनि मेरा पुत्र नहीं है ! इसीलिए शनि अपने पिता से शत्रु भाव रखते थे।  शनि देव ने अपनी  तपस्या द्वारा शिवजी को प्रसन्न किया।  भगवान शिव ने शनि देव को वरदान मांगने को कहा, तब उन्होंने कहा – युगों युगों से मेरी माता छाया की पराजय होती रही है, मेरे पिता सूर्य द्वारा उन्हें अनेक बार अपमानित किया गया है । माता की इच्छा है कि मेरा पुत्र अपने  पिता से भी ज्यादा शक्तिशाली बने। भगवान शंकर ने कहा कि नवग्रहों में तुम्हारा सर्वश्रेष्ठ स्थान होगा।  मानव तो क्या देवता भी तुम्हारे नाम से भयभीत रहेंगे। और आज तक सब उनसे भयभीत रहते हैं।
Shani Jayantiस्कन्द पुराण के काशी खंड में वर्णित है, कि छाया सुत शनिदेव ने अपने पिता भगवान सूर्य देव से कहा कि मैं ऐसा पद प्राप्त करना चाहता हूं, जिसे आज तक किसी ने प्राप्त नहीं किया, हे पिता ! आपके मंडल से मेरा मंडल सात गुना बड़ा हो, मुझे आपसे अधिक सात गुना शक्ति प्राप्त हो, मेरे वेग का कोई सामना नहीं कर पाये, चाहे वह देव, असुर, दानव, या सिद्ध साधक ही क्यों न हों।आपके लोक से मेरा लोक सात गुना ऊंचा रहे। मुझे मेरे आराध्य देव भगवान श्रीकृष्ण के प्रत्यक्ष दर्शन हों, तथा मैं भक्ति ज्ञान और विज्ञान से पूर्ण हो सकूं। शनिदेव की यह बात सुन कर भगवान सूर्य प्रसन्न हुए और कहा, बेटा ! मैं भी यही चाहता हूं, कि तू मेरे से सात गुना अधिक शक्ति वाला हो, पर इसके लिये तुझे तप करना होगा, तप करने के लिये तू काशी चला जा, वहां जाकर भगवान शंकर की तपस्या कर और शिवलिंग की स्थापना कर, तथा भगवान शंकर से मनवांछित फ़लों की प्राप्ति कर ले। शनि देव ने पिता की आज्ञानुसार वैसा ही किया तथा अपने मनोवांछित फल की प्राप्ति भगवान शंकर से की। उन्होंने ग्रहों में सर्वोपरि पद प्राप्त किया।

शनि मंत्र

ॐ ऐं ह्लीं श्रीशनैश्चराय नम:।
कोणस्थ पिंगलो बभ्रु: कृष्णो रौद्रोन्तको यम:।
सौरि: शनैश्चरो मंद: पिप्पलादेन संस्तुत:।।

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