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ज्यादा तेज़ी से घूम रही धरती, वैज्ञानिकों को बदलना पड़ेगा समय

2020 में जून महीने से धरती के घूमने के समय में देखा जा रहा बदलाव

ज्यादा तेज़ी से घूम रही धरती, वैज्ञानिकों को बदलना पड़ेगा समय

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धरती (Earth) ज्यादा तेज़ी से घूम (Move) रही है। 2020 में जून से लेकर अब तक धरती अपनी ही धुरी पर ज्यादा तेज़ी (Fast) से घूमी है। इसलिए अब साइंटिस्ट (scientist) को अपनी जगहों पर मौजूद एटॉमिक क्लॉक का टाइम भी बदलना पड़ेगा। आइए आपको समझाते हैं धरती (Earth) के तेज़ी से घूमने और अलग-अलग जगहों पर मौजूद एटॉमिक क्लॉक (Atomic clock) का समय बदलने का गणित क्या है।

दरअसल पिछले 50 सालों की तुलना करें तो 2020 जून से लेकर धरती ज्यादा तेजी से घूम रही है. ऐसे हालातों में अब वैज्ञानिक (scientist) इसे मैनेज करने में लगे हैं। आपको बता दें कि 24 घंटे से पहले अपनी धुरी पर धरती एक चक्कर पूरा कर रही है। ये बदलाव पिछले साल के मध्य में आया है।

धरती के तेज़ घूमने की वज़ह से सभी देशों का समय बदल जाता है। इसलिए साइंटिस्ट्स को भी अलग-अलग जगहों पर मौजूद एटॉमिक क्लॉक (Atomic clock) का समय बदलना पड़ता है. धरती तेज़ गति से घूम रही है इसलिए इस बार साइंटिस्ट्स को एटॉमिक क्लॉक में नेगेटिव लीप सेकेंड जोड़ना पड़ेगा. यहा आपको यह भी बता दें कि 1970 से अब तक वैज्ञानिकों द्वरा 27 लीप सेकेंड जोड़े जा चुके हैं। ब्रिटिश वेबसाइट डेली मेल में इस बाबत खबर प्रकाशित की गई है।

डेली मेल की खबर के अनुसार कई दशकों से धरती ज्यादा समय लेकर अपनी धुरी पर घूम रही थी। यह समय 24 घंटे से ज्यादा था, लेकिन 2020 में जून से धरती 24 घंटे से कम समय में चक्कर पूरा कर रही है. मौजूदा समय में धरती 24 घंटे में चक्कर पूरा करने के लिए 0.5 मिलीसेकेंड समय कम ले रही है. ऐसे में साफ ही है कि 24 घंटे में 0.5 मिलीसेकेंड भी कम हो चुके हैं।

12 महीनों में 28 बार तेज़ घूमी धरती

एक ओर जानकारी आपको बता दें कि 24 घंटे में 86 हज़ार 400 सेकेंड्स होते हैं. अब इसमें 2020 के जून माह से 0.5 मिलीसेकेंड की कमी आई है और 19 जुलाई, 2020 का दिन 24 घंटे से 1.4602 मिलीसेकेंड कम था. इससे पहले सबसे छोटा दिन 2005 में था। अब आप कहेंगे कि एक बार ही तो हुआ ऐसा, लेकिन यहीं सारी गड़बड़ है। पिछले 12 महीनों की बात करें तो छोटे दिन का ये रिकॉर्ड 28 बार टूट चुका है।

धरती तेज़ घूमने से क्या पडे़गा असर

इस समय में जो बदलाव आया है वह केवल एटॉमिक क्लॉक पर ही देखा जा सकता है। इस तबदीली की वजह से हमारी संचार व्यवस्था में काफी दिक्कत आ सकती है, क्योंकि सैटेलाइट्स और दूसरे कम्यूनिकेशन सिस्टम सोलर टाइम के अनुसार सेट किए गए हैं. पेरिस के इंटरनेशनल अर्थ रोटेशन सर्विस (International Earth Rotation Service) के वैज्ञानिक समय के साथ चलने के लिए 1970 के दशक से मौजूदा समय तक 27 लीप सेकेंड जोड़े जा चुके हैं।

आखिर बार साल 2016 में लीप सेकेंड (Leap second) जोड़ा गया था, लेकिन धरती के तेज़ी से घूमने के चलते इस बार वैज्ञानिकों को लीप सेकेंड हटाना होगा। मतलब साफ है कि इस बार नेगेटिव लीप सेकेंड जोड़ा जा सकता है। नेशनल फिजिकल लेबोरेटरी के सीनियर रिसर्च साइंटिस्ट पीटर व्हिब्बर्ली के मुताबिक धरती अपने तय समय से कम समय में चक्कर पूरा कर रही है। इसिलए संभावना है कि निगेटिव लीप सेकेंड जोड़ना पड़े।

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