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Pathania के नाम पर अब Kangra को साधने की तैयारी, जुझारूपन के चलते पाया मुकाम

Pathania के नाम पर अब Kangra को साधने की तैयारी, जुझारूपन के चलते पाया मुकाम

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नूरपुर। राकेश पठानिया (Rakesh Pathania) नाम आते ही जुझारू शब्द मुंह पर आने लगता है। आएगा भी क्यों नहीं, संघर्ष की बात करें तो पठानिया ने राजनीतिक तौर पर कड़ा संघर्ष करते हुए ही आज कैबिनेट (Cabinet) में ये मुकाम पाया है। पठानिया कैबिनेट में जगह पाने के लिए बीते अढाई वर्षों से संघर्ष कर रहे थे तो सरकार के लिए ढाल बनकर भी काम कर रहे थे। वक्त आया और पठानिया कैबिनेट में पहुंचने में सफल रहे। बीजेपी (BJP)को भी इस वक्त राजनीतिक रूप से सबसे बड़े जिला कांगड़ा (Distt Kangra) को साधने के लिए किसी जुझारू की जरूरत महसूस हो रही थी। पठानिया नाम से बेहतरीन विकल्प शायद पार्टी को भी नहीं दिख रहा था,तीसरी मर्तबा नूरपुर (Nurpur) का किला फतेह कर पठानिया विधानसभा की दहलीज पार करने शिमला पहुंचे थे।

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बड़बोलेपन के लिए मशहूर हैं पठानिया

बड़बोलेपन के लिए मशहूर पठानिया दोस्तों के भी दोस्त कहलाए जाते हैं तो जरूरतमंद के लिए कभी पीछे नहीं हटते। पठानिया जिस वक्त पहली मर्तबा वर्ष 1998 में नूरपुर से जीत दर्ज कर शिमला पहुंचे थे, तो उस वक्त भी सरकार गठन में उनकी भूमिका सराहनीय रही थी। उसी के चलते उन्हें वर्ष 1998 से 2003 तक पर्यटन विकास निगम के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी सौंपी गई। वह पांच साल तक चर्चा का केंद्र रहे। उसके बाद वह पुनः 2007 में विधानसभा (Vidhansabha) के लिए चुने गए, पर पार्टी ने इस मर्तबा उन्हें ना जाने क्यों अपने से अलग कर लिया, लेकिन पठानिया ने संघर्ष करते हुए अपने दम पर निर्दलीय ही चुनाव जीत लिया। हालांकि,वह बीजेपी के ही सहयोगी विधायक के तौर पर पांच साल तक काम करते रहे। इसके बाद वर्ष 2017 में तेरहवीं विधानसभा के लिए पठानिया तीसरी बार फिर से विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए।

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राजपूत नेता की तलाश हुई पूरी

कर्नल काहन सिंह के घर 15 नवम्बर, 1964 को गांव लदोड़ी जिला कांगड़ा में जन्में पठानिया इस दौरान लोक प्रशासन समिति के अध्यक्ष और लोक लेखा और नियम, पुस्तकालय तथा सुविधा समितियोंके सदस्य भी रहे। तैराकी और ऐथलेटिक्स में विशेष रूची रखने वाले पठानिया इस वक्त नूरपुर में एक नर्सिंग कॉलेज का भी संचालन करते हैं। उन्होंने अपनी मेहनत के दम पर ही अपने व्यवसाय को भी खूब बढ़ाने का काम बराबर किया है। आज जब बीजेपी की प्रदेश सरकार अढाई साल का कार्यकाल पूरा कर,अगले चुनाव यानी 2022 की तरफ देखने लगी है,तो यही पठानिया कांगड़ा में पतवार लेकर सबसे आगे चलते नजर आएंगे,ऐसा पार्टी भी मानकर चल रही है। कांगड़ा की राजनीति लंबे समय से एक राजपूत नेता (Rajput leader) की भी तलाश कर रही थी,शायद पठानिया के जयराम कैबिनेट (Jai Ram Cabinet) में शामिल होने के बाद वह कमी भी पूरी हो गई है।

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