Covid-19 Update

2,26,859
मामले (हिमाचल)
2,22,190
मरीज ठीक हुए
3,825
मौत
34,555,431
मामले (भारत)
260,661,944
मामले (दुनिया)

कब है सुहाग का पर्व करवा चौथ, इस बार चांद का पूजन होगा विशेष फलदायी

इस बार करवाचौथ का व्रत 24 अक्टूबर रविवार के दिन रखा जाएगा

कब है सुहाग का पर्व करवा चौथ, इस बार चांद का पूजन होगा विशेष फलदायी

- Advertisement -

हर साल कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को करवाचौथ का त्योहार मनाया जाता है। इस दिन पति की लंबी आयु के लिए महिलाएं व्रत रखती हैं और शाम को श्रृंगार करके तैयार होती हैं और चंद्रमा का पूजन करती हैं, अर्घ्य देती हैं और छलनी से चांद को देखती हैं। तिलक करने के बाद पति के पैर छूकर आशीर्वाद लेती हैं और पति के हाथों से जल ग्रहण करती हैं। इसके बाद वे अपना व्रत खोलती हैं। इस बार करवाचौथ का व्रत 24 अक्टूबर रविवार के दिन रखा जाएगा।

यह भी पढ़ें:Karwa Chauth Special: व्रत वाले दिन महिलाएं भूलकर भी न करें ये काम

 

 

शुभ मुहूर्त और चंद्रोदय का समय

व्रत तिथि : 24 अक्टूबर 2021, दिन रविवार
चतुर्थी तिथि आरंभ : 24 अक्टूबर 2021 रविवार को सुबह 03 बजकर 01 मिनट से
चतुर्थी तिथि समाप्त : 25 अक्टूबर 2021 सोमवार को सुबह 05 बजकर 43 मिनट पर

24 अक्टूबर को शाम 5:45 बजे से 6:59 बजे तक पूजन का शुभ मुहूर्त है। इस बार करवा चौथ में चांद का पूजन विशेष फलदायी होगा। चंद्रमा का पूजन महिलाओं के लिए पति और बच्चों के लिए अच्छा रहेगा। करवा चौथ का पूजन चंद्रोदय के पहले करना उत्तम होगा। चंद्रोदय रात 8.07 बजे होगा। इससे पहले प्रदोष बेला में 7.30 बजे तक पूजन कर सकते हैं। चतुर्थी 23 को सुबह 3:01 बजे से शुरू होकर 25 अक्टूबर को 5:43 बजे तक रहेगी।

 

 

करवा चौथ की कथा

कहा जाता है कि एक साहूकार के 7 बेटे थे और एक बेटी थी। एक बार साहूकार की बेटी ने अपने मायके में पति की लंबी आयु के लिए करवा चौथ का व्रत रखा। लेकिन भूख और प्यास से उसकी हालत खराब होने लगी। सातों भाई अपनी इकलौती बहन से बहुत प्यार करते थे. उनसे बहन की ये हालत देखी नहीं गई। उन्होंने चांद निकलने से पहले ही एक पेड़ की आड़ में छलनी के पीछे एक जलता हुआ दीपक रखकर बहन को कहा कि चांद निकल आया है। बहन ने छलनी में रखे उस दीपक की रोशनी को चांद समझ लिया और अर्घ्य देकर अपना व्रत खोल लिया. भाइयों ने छल से उनका चौथ का व्रत खुलवा दिया। इससे करवा माता उससे रुठ गईं और कुछ देर में उसके पति की मृत्यु हो गई। इसके बाद महिला को अपनी भूल का अहसास हुआ और उसने माता से अपनी भूल की क्षमा मांगी और उसने अगले साल कार्तिक मास में कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को व्रत रखा। किसी भी तरह के छल से बचने के लिए उसने खुद ही हाथ में छलनी लेकर और उसमें दीपक रखकर चंद्र देव के दर्शन किए। इसके बाद उसका पति जीवित हो गया। कहा जाता है कि तभी से छलनी को हाथ में लेकर चांद को निहारने की प्रथा की शुरुआत हो गई।

 

 

हिमाचल और देश-दुनिया के ताजा अपडेट के लिए like करे हिमाचल अभी अभी का facebook page

 

- Advertisement -

हिमाचल अभी अभी बुलेटिन

Download Himachal Abhi Abhi App Himachal Abhi Abhi IOS App Himachal Abhi Abhi Android App


विशेष \ लाइफ मंत्रा


Himachal Abhi Abhi E-Paper



सब्सक्राइब करें Himachal Abhi Abhi अलर्ट
Logo - Himachal Abhi Abhi

पाएं दिनभर की बड़ी ख़बरें अपने डेस्कटॉप पर

अभी नहीं ठीक है