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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस : प्रेम, स्नेह व करुणा की प्रतिमूर्ति “नारी”

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस : प्रेम, स्नेह व करुणा की प्रतिमूर्ति “नारी”

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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस एक खास कार्यक्रम है जिसे लोगों के साथ ही व्यापार, राजनीतिक, समुदायिक, शिक्षण संस्थानों, आविष्कारक, टीवी व्यक्तित्व आदि महिला नेतृत्व के द्वारा 8 मार्च को पूरे विश्व भर में मनाया जाता है। इस संदर्भ में महिला अधिकार, महिलाओं के मुद्दे, लंच, प्रतियोगी गतिविधि, भाषण, प्रस्तुतिकरण, चर्चा, बैनर, सम्मेलन, महिला परेड तथा सेमिनार जैसे विभिन्न प्रकार कार्यक्रम के आयोजन के द्वारा इसे मनाया जाता है। इसे पूरे विश्व भर में उनके अधिकार, योगदान, शिक्षा की महत्ता, आजीविका आदि के मौके के लिये महिलाओं के बारे में जागरुकता बढ़ाने के लिए मनाया जाता है। महिला शिक्षिका को उनके विद्यार्थियों द्वारा, अपने बच्चों के द्वारा माता-पिता को, बहनों को भाईयों के द्वारा, पुत्री को अपने पिता के द्वारा उपहार दिया जाता है। ज्यादातर व्ययसायिक संस्थाएं, सरकारी और गैर-सरकारी कार्यालय, शिक्षण संस्थान, इस दिन बंद रहते हैं। आमतौर पर इस उत्सव को मनाने के दौरान लोग बैंगनी रंग का रिबन पहने रहते हैं।


हमारी भारतीय संस्कृति ने सदैव ही नारी जाति को पूज्यनीय एवं वन्दनीय माना है, नारी का रूप चाहे मां के रूप में हो, बहन हो, बेटी हो अथवा पत्नी के रूप में हो। नारी सम्मान की बात आदिकाल से ही हमारे.. हमारे पौराणिक गाथाओं में विद्यमान रही है। हमें यह भी ज्ञात है कि नारी प्रेम, स्नेह, करुणा एवं मातृत्व की प्रतिमूर्ति है। जिस प्रकार कोई भी पक्षी एक पंख के सहारे उड़ नहीं सकता, उसी प्रकार नारी के बिना… पुरुष की कल्पना भी नहीं की जा सकती। विश्व की आधी आबादी महिलाओं की है, लेकिन भारतीय समाज में महिला को वह स्थान आज तक प्राप्त नहीं हो सका है जिसकी वह हकदार है। भारतीय समाज सदैव से ही पुरुष प्रधान माना गया है, लेकिन इस कथन के बदलाव की बयार 21 वीं सदी से प्रारंभ हो चुकी है।
स्त्रियों को पुरुष के समान दर्जा दिए जाने का सिलसिला शुरू हो चुका है एवं भारतीय महिलाएं आज प्रत्येक क्षेत्र में पुरुष से कंधे से कंधा मिलाकर अपना योगदान दे रही हैं।चाहे शिक्षा, बैंकिंग, स्वास्थ्य, मनोरंजन, आईटी अथवा राजनीतिक क्षेत्र हो। कई क्षेत्रों में तो भारतीय महिलाएं पुरुषों से भी कहीं बेहतर योगदान दे रही हैं। भारतीय महिलाओं के इसी जज्बे को सलाम करते हुए ही हमारी सरकारों ने महिलाओं के लिए विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं को लागू किया। इसके विपरीत हमारे देश में महिला अत्याचार की बढ़ती घटनाओं ने भारतीय नारी की सुरक्षा पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। दिल्ली गैंगरेप, पंजाब के तरण तारण में सरेआम युवती की पुलिस द्वारा की गई पिटाई और पटना में महिला शिक्षकों पर किया गया लाठीचार्ज हमारे देश के लिये शर्मिंदगी का विषय है।
भारतीय नारी जिसे अबला कहा जाता रहा है, ने आज अपने कौशल एवं जज्बे से विश्वभर में अपनी एक अलग पहचान कायम की है, आज भारतीय नारी चूल्हे-चौके से बाहर आकर समाज एवं देश निर्माण में अपना अमूल्य योगदान दे रही हैं। ऐसे में इस प्रकार की वारदातों ने महिला की सुरक्षा पर ही सवाल खड़ा कर दिया है और हमें यह सोचने पर विवश कर दिया है कि क्या नारी सुरक्षित है।

घटती लड़कियां :

भारत में अब भी ज्यादातर परिवार चाहते हैं कि उनके घर में लड़का पैदा हो। एक नए शोध से पता चला है कि लिंग निर्धारण के बाद हुए गर्भपातों के कारण पिछले दशक में जन्मी लड़कियों की संख्या 70 लाख कम रही। ब्रिटिश मेडिकल जर्नल लैंसेट में छपी रिपोर्ट के मुताबिक जिन परिवारों में पहला बच्चा लड़की हुई और अल्ट्रासाउंड में उन्हें पता चला कि दूसरा बच्चा भी लड़की है तो उसे गर्भ में ही मार दिया जाता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि गरीब परिवारों के मुकाबले समृद्ध परिवारों में इस तरह लिंग आधारित गर्भपात ज्यादा होते हैं।

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