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अपरा एकादशी : श्रद्धाभाव से करें भगवान विष्णु की पूजा, जानिए शुभ मुहूर्त और पूजन विधि

अपरा एकादशी :  श्रद्धाभाव से करें भगवान विष्णु की पूजा, जानिए शुभ मुहूर्त और पूजन विधि

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हिंदू धर्म में हर व्रत और हर त्योहार का अपना महत्व होता है। हिंदी पंचांग के शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष के प्रत्येक ग्यारहवीं तिथि को एकादशी कहते हैं। एक वर्ष में कुल 24 एकादशी होती हैं। वहीं, मलमास होने पर इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा पूरे श्रद्धाभाव से की जाती है। एकादशी का व्रत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। ज्येष्ठ मास कृष्ण पक्ष की एकादशी को अपरा एकादशी ( (Apara Ekadashi)) कहा जाता है। इस साल अपरा एकादशी 5-6 जून को मनाई जाएगी। अपरा एकादशी के बारे में आपको जानकारी देते हैं और बताते हैं इसके मुहूर्त और पूजन विधि के बारे में –

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शुभ मुहूर्त :

एकादशी तिथि प्रारम्भ – जून 05, 2021 को 04:07 बजे से
एकादशी तिथि समाप्त – जून 06, 2021 को 06:19 बजे तक

पूजन विधि :

अपरा एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर घर की साफ-सफाई करें। इसके बाद स्नान करने के बाद स्‍वच्‍छ वस्‍त्र धारण करें व्रत का संकल्प लें। इसके बाद घर के मंदिर में भगवान विष्‍णु और बलराम की प्रतिमा, फोटो या कैलेंडर के सामने दीपक जलाएं। इसके बाद विष्णु की प्रतिमा को अक्षत, फूल, मौसमी फल, नारियल और मेवे चढ़ाएं। विष्णु की पूजा करते वक्त तुलसी के पत्ते अवश्य रखें। इसके बाद धूप दिखाकर श्री हरि विष्णु की आरती उतारें। इसके बाद सूर्यदेव को जल अर्पित करें और फिर एकादशी की कथा सुनें या सुनाएं। व्रत के दिन निर्जला व्रत करें। शाम के समय तुलसी के पास गाय के घी का एक दीपक जलाएं। व्रत में रात के समय सोना नहीं चाहिए बल्कि भगवान का भजन-कीर्तन करना चाहिए। अगले दिन पारण के समय किसी ब्राह्मण या गरीब को यथाशक्ति भोजन करवाएं और दक्षिणा देकर विदा करें। इसके बाद अन्‍न और जल ग्रहण कर व्रत समाप्त करें।

अपरा एकादशी के पीछे की कथा कुछ इस प्रकार है –

महीध्वज नामक एक धर्मात्मा राजा था। राजा का छोटा भाई वज्रध्वज बड़े भाई से द्वेष रखता था। एक दिन अवसर पाकर इसने राजा की हत्या कर दी और जंगल में एक पीपल के नीचे गाड़ दिया। अकाल मृत्यु होने के कारण राजा की आत्मा प्रेत बनकर पीपल पर रहने लगी। मार्ग से गुजरने वाले हर व्यक्ति को आत्मा परेशान करती थी। एक दिन एक ऋषि इस रास्ते से गुजर रहे थे। इन्होंने प्रेत को देखा और अपने तपोबल से उसके प्रेत बनने का कारण जाना। ऋषि ने पीपल के पेड़ से राजा की प्रेतात्मा को नीचे उतारा और परलोक विद्या का उपदेश दिया। राजा को प्रेत योनी से मुक्ति दिलाने के लिए ऋषि ने स्वयं अपरा एकादशी का व्रत रखा और द्वादशी के दिन व्रत पूरा होने पर व्रत का पुण्य प्रेत को दे दिया। एकादशी व्रत का पुण्य प्राप्त करके राजा प्रेतयोनी से मुक्त हो गया और स्वर्ग चला गया। ऐसी मान्यता है कि अपरा एकादशी की कथा पढ़ने अथवा सुनने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है।

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