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तीनों लोकों की स्वामिनी हैं मां भुवनेश्वरी

तीनों लोकों की स्वामिनी हैं मां भुवनेश्वरी

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दस महाविद्याओं में चतुर्थ स्थान पर भुवनेश्वरी महाविद्या” विद्यमान है, जो त्रिभुवन (ब्रह्माण्ड) पालन एवं उत्पत्ति कर्ता मानी गयी है। भुवनेश्वरी शब्द भुवन से बना है, जिसका अर्थ है “भुवनत्रय” अर्थात तीनों लोक। अतः भुवनेश्वरी तो तीनों लोकों की अधिष्ठात्री देवी है, उनकी नियन्ता है और इन तीनों ही लोकों में सब के द्वारा पूजनीय है।


वस्तुतः भुवनेश्वरी साधना भोग और मोक्ष दोनों को समान रूप से देने वाली उच्च कोटि की साधना है, इसके बारे में संसार के कई तान्त्रिक, मान्त्रिक ग्रन्थों में विशेष रूप से उल्लेख है। “शाक्त प्रमोद में बताया गया है कि भुवनेश्वरी साधना समस्त साधनाओं में श्रेष्ठ है और इस साधना से जीवन की सभी इच्छाएँ पूर्ण होती है। अतः जो साधक अपने जीवन में सभी प्रकार की समस्याओं का समाधान चाहते हैं, उन्हें भुवनेश्वरी साधना अवश्य ही सम्पन्न करनी चाहिए। पंच तत्व आकाश, वायु, पृथ्वी ,अग्नि जल इन्हीं देवी की शक्तियों द्वारा संचालित होती हैं। देवी की इच्छानुसार ही चराचर ब्रह्माण्ड (तीनों लोकों) के समस्त तत्वों का निर्माण होता हैं। प्रकृति से संबंधित होने के कारण देवी की तुलना मूल प्रकृति से भी की जाती हैं। देवी भक्तों को समस्त प्रकार की सिद्धियां तथा अभय प्रदान करती हैं।

कमल के आसान पर विराजमान

देवी भुवनेश्वरी, अत्यंत कोमल एवं सरल स्वभाव सम्पन्न हैं। देवी भिन्न-भिन्न प्रकार के अमूल्य रत्नों से युक्त अलंकारों को धारण करती हैं, स्वर्ण आभा युक्त उदित सूर्य के किरणों के समान कांति वाली देवी, कमल के आसान पर विराजमान हैं तथा उगते सूर्य या सिंदूरी वर्ण से शोभिता हैं। देवी, तीन नेत्रों से युक्त त्रिनेत्रा हैं जो  इच्छा, काम तथा प्रजनन शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं। मंद-मंद मुस्कान वाली, अपने मस्तक पर अर्ध चन्द्रमा धारण करने वाली देवी अत्यंत मनोहर प्रतीत होती हैं।


‘देवी काली और भुवनेशी या भुवनेश्वरी’ प्रकारांतर से अभेद हैं काली का लाल वर्ण स्वरूप ही भुवनेश्वरी हैं। दुर्गम नामक दैत्य के अत्याचारों से संतृप्त हो, सभी देवता, ऋषि तथा ब्राह्मणों ने हिमालय पर जा, सर्वकारण स्वरूपा देवी भुवनेश्वरी की ही आराधना की थी। देवताओं, ऋषियों तथा ब्राह्मणों के आराधना-स्तुति से संतुष्ट हो देवी, अपने हाथों में बाण, कमल पुष्प तथा शाक-मूल धारण किये हुए प्रकट हुई थी। देवी ने अपने नेत्रों से सहस्रों अश्रु जल धारा प्रकट की तथा इस जल से सम्पूर्ण भू-मंडल के समस्त प्राणी तृप्त हुए। समुद्रों तथा नदियों में जल भर गया तथा समस्त वनस्पति सिंचित हुई। अपने हाथों में धारण की हुई, शाक-मूलों से इन्होंने सम्पूर्ण प्राणियों का पोषण किया, तभी से ये शाकम्भरी नाम से भी प्रसिद्ध हुई। इन्होंने ही दुर्गमासुर नामक दैत्य का वध कर समस्त जगत को भय मुक्त, इस कारण देवी दुर्गा नाम से प्रसिद्ध हुई, जो दुर्गम संकटों से अपने भक्तों को मुक्त करती हैं।

ॐ उद्यद्दिनद्युतिमिन्दु किरीटां तुङ्गकुचां नयनत्रययुक्ताम्।
स्मेरमुखीं वरदाङ्कुशपाशाभीति करां प्रभजेत् भुवनेशीम्॥

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