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पितृ पक्ष के दिनों में जरूर करें इन नियमों का पालन, पूर्वज होंगे प्रसन्न

श्राद्ध कर्म से संतुष्ट होकर पितर हमें आयु, पुत्र, यश, वैभव, समृद्धि देते हैं

पितृ पक्ष के दिनों में जरूर करें इन नियमों का पालन, पूर्वज होंगे प्रसन्न

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पितृ पक्ष अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि से शुरू होकर अश्विन मास की अमावस्या तक होते हैं। इन 15 दिनों में अपने पितरों को तिथि पर याद करते हुए उन्हें तर्पण , श्राद्ध कर्म और दान आदि करके उनकी आत्मा को तृप्त किया जाता है। गरुड़ पुराण के अनुसार श्राद्ध कर्म से संतुष्ट होकर पितर हमें आयु, पुत्र, यश, वैभव, समृद्धि देते हैं। स्कंद पुराण के अनुसार श्राद्ध में पितरों की तृप्ति ब्राह्मणों के द्वारा ही होती है। श्राद्ध के पिंडो को गाय, कौवा अथवा अग्रि या पानी में छोड़ दें। पितृ पक्ष के दौरान कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी होता है। कुछ नियम हैं, अगर श्राद्ध विधि पूर्वक किया जाए, तो पितरों प्रसन्न होकर वापस लौटते हैं

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श्राद्ध का खाना बनाते समय दक्षिण की तरफ मुंह करके खाना नहीं बनाना चाहिए। पूर्व की तरफ मुंह करके ही खाना बनाना चाहिए। आप किस दिशा की ओर मुंह करके खाना बनाते हैं और किस दिशा की ओर मुंह करके खाना खाते हैं, इस पर कई बातें निर्भर करती हैं क्योंकि वास्तु शास्त्र के अनुसार घर में सब से महत्वपूर्ण हिस्सा रसोई को माना जाता है।आपका रसोई घर में किसी भी दिशा में हो, लेकिन खाना बनाने वाले का मुंह पूर्व दिशा की ओर ही रहे, ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए।

 

 

शास्त्रों में चांदी को सबसे पवित्र, शुद्ध और अच्‍छी धातु माना गया है। श्राद्ध में ब्राह्मणों को चांदी के बर्तन में भोजन कराने से बहुत पुण्य मिलता है। इसमें भोजन कराने से समस्त दोषों और नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है, ऐसा शास्त्रों में कहा गया है। अगर चांदी के बर्तन में रखकर पानी पितरों को अर्पण किया जाए तो वे संतुष्ट होते हैं।चांदी की थाली या बर्तन उपलब्ध न हो तो सामान्य कागज की प्लेट या दोने-पत्तल में भी भोजन खिलाया जा सकता हैं।

श्राद्ध का भोजन बनाते समय चप्‍पल (जूते) पहनने से बचना चाहिए।जैसा कि आजकल अधिकांश घरों में होता हैं। यदि कोई अन्य व्यक्ति (हलवाई या कारीगर) भी ऐसे में श्राद्ध का भोजन बनाये तो ध्यान रखें, जूते ना पहने हो। आप लकड़ी की चप्‍पल पहनकर भोजन निर्माण कर सकते हैं क्‍योंकि लकड़ी को शुद्ध माना जाता है। पुरातन समय में चमड़े का जूता पहनना, कई धार्मिक कारणों से मान्य नही था। इसलिए खड़ाऊ का ही इस्तेमाल किया जाता था।

 

 

श्राद्ध में खीर का विशेष महत्‍व है, लेकिन कोशिश करें कि खीर गाय के दूध से बना हो। भैंस के दूध को प्रयोग नही करना चाहिए। श्राद्ध में दूध, दही, घी का इस्तेमाल किया जाता है। इस बात का ध्यान रखें कि दूध, दही, घी गाय का ही हो।

पंडितों के अनुसार खीर सभी पकवानों में से उत्तम है। खीर मीठी होती है और मीठे खाने के बाद ब्राह्मण संतुष्ट हो जाते हैं जिससे पूर्वज भी खुश हो जाते हैं। पूर्वजों के साथ-साथ देवता भी खीर को बहुत पसंद करते हैं इसलिए देवताओं को भोग में खीर चढ़ाया जाता हैं।

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श्राद्ध के दिन लहसुन, प्याज रहित सात्विक भोजन ही घर में बनाना चाहिए। मूली, बैंगन, आलू, अरबी आदि जमीन के नीचे पैदा होने वाली सब्जियां पितरों के श्राद्ध के दिन नहीं बनाई जाती है। इस दिन उड़द की दाल के बड़े, दूध घी से बने पकवान, चावल की खीर, बेल पर लगने वाले मौसमी सब्जियां जैसी लौकी, तोरी, भिंडी, सीताफल और कच्चे केले की सब्जी ही बनानी चाहिए।

श्राद्ध के दिन प्याज, लहसुन रहित सात्विक भोजन ही घर बनाना चाहिए, जिसमें देसी-घी, दूध से बने व्यंजन, चावल, पूरी, बेल पर लगने वाली मौसमी सब्जियां जैसे कि तोरई, लौकी आदि सब्जी ही बनानी चाहिए।

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