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भगवान शिव की पूजा में शंख का उपयोग क्यों है वर्जित? जानें इसके पीछे की पौराणिक कथा और रहस्य
Bhagwan Shiv: हिंदू धर्म में पूजा-पाठ के दौरान शंख बजाना और उससे जल अर्पित करना बेहद पवित्र और अनिवार्य माना जाता है। लेकिन, देवाधिदेव महादेव (भगवान शिव) की पूजा के नियम थोड़े अलग हैं। शिवजी की आराधना में शंख बजाना या शंख से जलाभिषेक करना पूरी तरह से वर्जित है। आम लोगों के मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि जो शंख इतना शुभ है, उसका शिव पूजा में उपयोग क्यों नहीं होता? आइए जानते हैं इसके पीछे के पौराणिक, धार्मिक और आध्यात्मिक कारण।
शंखचूड़ असुर की पौराणिक कथा
शिव पुराण के अनुसार, शंख के उपयोग पर प्रतिबंध के पीछे एक रोचक और प्राचीन कथा है:
असुर का आतंक: प्राचीन काल में शंखचूड़ नाम का एक अत्यंत पराक्रमी और अत्याचारी असुर था। उसने अपनी शक्तियों से तीनों लोकों पर कब्जा कर लिया था, जिससे देवता त्राहि-त्राहि कर रहे थे।
शिव द्वारा संहार: देवताओं की करुण पुकार सुनकर भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से शंखचूड़ का वध कर दिया और संसार को उसके आतंक से मुक्त कराया।
शंख की उत्पत्ति: धार्मिक मान्यता है कि शंखचूड़ के भस्म होने के बाद उसकी हड्डियों और राख से ही ‘शंख’ की उत्पत्ति हुई। चूंकि शिव ने स्वयं उसका संहार किया था, इसलिए उसके प्रतीक यानी शंख से शिवजी का अभिषेक करना या उनकी पूजा में इसे बजाना वर्जित हो गया।
विष्णु जी को प्रिय, लेकिन शिव के लिए वर्जित
शंख को भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का अत्यंत प्रिय माना जाता है। इसके पीछे भी शंखचूड़ का ही रहस्य छिपा है। दरअसल, शंखचूड़ अपने पूर्व जन्म में भगवान विष्णु का परम भक्त था। यही कारण है कि श्रीहरि ने उसकी भस्म से उत्पन्न शंख को अपनी पूजा में विशेष स्थान दिया और इसे अपने प्रमुख अस्त्रों में शामिल कर लिया।
शिव हैं वैराग्य और मौन के देवता
पौराणिक कथाओं के अलावा, शंख का प्रयोग न करने का एक बड़ा आध्यात्मिक कारण भी है:
शिव जी श्मशान वासी और वैराग्य के देवता हैं। उनकी पूजा-आराधना में ध्यान, मौन और तपस्या का विशेष महत्व है। शिव पूजा में शोरगुल करना फलदायी नहीं माना जाता, बल्कि मौन साधना को उत्तम कहा गया है।
शंख की ध्वनि उत्सव, मंगल, विजय और वैष्णव परंपरा का प्रतीक है, जो शिवजी के शांत और वैरागी स्वभाव के बिल्कुल विपरीत है।
शिव पूजा में इन विशेष नियमों का भी रखें ध्यान
भगवान शिव मात्र एक लोटा जल से प्रसन्न हो जाने वाले देवता (भोलेनाथ) हैं, लेकिन उनकी पूजा में कुछ खास सावधानियां बरतनी चाहिए:
महादेव को जल या पंचामृत अर्पित करने के लिए हमेशा तांबे या पीतल के पात्र का ही इस्तेमाल करें। शंख का प्रयोग भूलकर भी न करें।
शिव पूजा में तुलसी की पत्तियां चढ़ाना भी निषिद्ध है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, तुलसी पूर्वजन्म में शंखचूड़ की पत्नी वृंदा थीं।
महादेव की पूजा में केतकी के फूल का इस्तेमाल भी नहीं किया जाता है; इसे शिवलिंग से हमेशा दूर रखना चाहिए।
भगवान शिव की पूजा बड़ी ही सरल और सहज है। सच्चे मन और एकाग्रता के साथ चढ़ाया गया एक लोटा जल ही महादेव को प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए पर्याप्त है।

