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इस इमली के पेड़ के पत्ते खाने से निकलती है तानसेन जैसी सुरीली आवाज, दुनियाभर में फेमस

देश-विदेशों से पत्ते खाने के लिए आते हैं लोग, ना बोलने वाले भी लगते हैं बोलने

इस इमली के पेड़ के पत्ते खाने से निकलती है तानसेन जैसी सुरीली आवाज, दुनियाभर में फेमस

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हम आपको आज एक जादुई इमली के पेड़ (Tree) के बारे में बताने जा रहे है, जिसके सिर्फ पत्ते खाने के लिए ही देश (Country) और दुनिया भर से लोग आते है। आप सोच रहे होंगे कि सिर्फ पत्ते खाने के लिए ही ये लोग इतनी दूर से क्यों आते है। इसके पीछे छिपा है एक जादुई रहस्य। आपको बताते चलें कि यह पेड़ 600 साल पुराना है और जो लोग बोल नहीं सकते, इसके पत्ते खाने से कुछ समय बाद बोलने लग जाते है। आपको यकीन नहीं हो रहा तो पढ़िए पूरी खबर।

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पेड़ ने तानसेन को संगीत सम्राट बनाया

संगीत सम्राट तानसेन (Sangeet Samrat Tansen) को पूरी दुनिया जानती है। महान संगीतज्ञ तानसेन की आवाज में वो दम था कि जब वे राग दीपक (Lamp) गाते तो दीप जल उठते, मेघ मल्हार गाते तो बादल (Cloud) बरसने लगते थे। ये उनकी आवाज का ही जादू था। आपको बताते चलें कि ग्वालियर (Gwalior) के बेहट गांव में रहने वाले तानसेन 5 साल की उम्र तक कुछ बोल नहीं पाते थे। परिवार के लोग तानसेन को ग्वालियर लाए। यहां उस्ताद मोहम्मद गौस (Ustad Mohammad Ghaus) ने तानसेन को गोद ले लिया और संगीत (Music) की तालीम शुरू की। धीरे-धीरे तानसेन बोलने तो लगे, लेकिन उनकी आवाज सुरीली नहीं हुई थी। गुरु के बताने पर तानसेन ने यहां लगे इमली के पेड़ की पत्तियों को खाना शुरू किया। करामाती इमली के पत्तों ने तानसेन का गला सुरीला कर दिया। संगीत की तालीम ले रहे तानसेन ने कठिनतम सुर साध लिए। उनकी गायकी मशहूर हुई। तानसेन ने उस दौर में ग्वालियर के तोमर शासकों सहित देश की कई रियासतों के लिए गायकी पेश की। उनकी ख्याति के चलते मुगल शासक अकबर ने अपने दरबार मे बुलाया और उन्हें अपने नौ रत्नों में शामिल कर लिया।

दुनियाभर के गीत-संगीतकार के लिए धरोहर से कम नहीं

अपनी गायकी के दम पर तानसेन को दुनिया (World) में महान संगीतकार की पहचान मिली। आज ये इमली का पेड़ दुनियाभर के गीत-संगीतकारों के लिए धरोहर से कम नहीं है। माना जाता है कि इस इमली के पेड़ के पत्ते खाने से आवाज करामाती हो जाती है। यही वजह है कि दूर-दूर से लोग आकर इसके पत्ते चबाते हैं। कई लोग इन पत्तों को अपने साथ ले जाते हैं। तानसेन समाधि स्थल के पास लगा ये इमली का पेड़ आज भी वैसा का वैसा खड़ा है।

600 साल से संगीतकारों का तीर्थ स्थल है ये पेड़

तानसेन समाधि स्थल के पास ही लगा ये इमली का पेड़ सन 1400 के आसपास का बताया जाता है। मान्यता है कि इस करामाती इमली के पत्ते खाने से आवाज सुरीली होती है। इस वजह से दूर.दूर से संगीत साधक और संगीत प्रेमी ग्वालियर आकर इस इमली के पत्ते खाते हैं। देश के कई गायकों ने यहां आकर इसके पत्ते चबाएं हैंए तो कई कलाकारों ने यहां से इमली के पत्ते मंगवाकर खाएं है। ये पेड़ करीब 600 साल से आस्था और विश्वास का केंद्र बना हुआ है।

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