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ऐसे ही हालात रहे तो नहीं मिलेगा पीने को पानी, वैज्ञानिकों की चेतावनी पर हो जाइए अलर्ट

शिमला में ‘सुदृढ हिमालय सुरक्षित भारत’ विषय के तहत ग्लेशियरों की पिघलने पर हो रहा मंथन

ऐसे ही हालात रहे तो नहीं मिलेगा पीने को पानी, वैज्ञानिकों की चेतावनी पर हो जाइए अलर्ट

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शिमला। जिस प्रकार से जलवायु परिवर्तन (Climate Change) हो रहा है, आने वाले कुछ सालों में हमें पानी समस्या (Water Problem) से जूझना पड़ सकता है। जिस तेजी से ग्लेशियर (Glacier) पिघल रहे हैं, हमें सूखे और बाढ़ जैसी समस्याओं से जूझना पड़ सकता है। जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा कारण प्रदूषण (Pollution) है और उसके बाद धीरे-धीरे साफ हो रहे जंगल। हम पेड़ तो काट रहे हैं, लेकिन उनकी जगह नए पेड़ नहीं लगा रहे हैं। तभी तो आज जलवायु परिवर्तन पूरे विश्व (World) के लिए बहुत बड़ी समस्या बन गई है। बढ़ते तापमान के कारण लगातार पिघलते ग्लेशियर हिमालयी क्षेत्रों के लिए आगामी वर्षों में खतरे की घंटी हो सकते हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण आ रही आपदाओं पर कैसे विराम लगाया जाएए इसको लेकर ‘सुदृढ हिमालय सुरक्षित भारत’ विषय पर शिमला (Shimla) में दो दिन मंथन किया जा रहा है, जिसकी शुरुआत आज से हो गई। कॉन्क्लेव में देशभर से एक्सपर्ट जलवायु परिवर्तन पर विचार साझा कर रहे हैं। इसमें भारत में जर्मनी (Germany) के राजदूत वाल्टर जे. लीनेयर उपस्थित रहे।

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इस अवसर पर सीएम जयराम ठाकुर ने कहा कि इस चुनौती की समय रहते तैयारी करना जरूरी है। पिछले कुछ समय से ग्लेशियर कम हो रहे हैं। जलवायु परिवर्तन का पूरे विश्व के लिए चिंता है। विकास के लिए प्रकृति को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि प्रदूषण के कारण जलवायु में परिवर्तन हो रहा है। ग्लेशियर के पिघलने से आने वाले वर्षों में पानी की कमी हो सकती है। तापमान (Temperature) में वृद्धि के कारण ग्लेशियर पिघल रहे हैं, जिससे बाढ़, सूखा जैसी आपदाएं उत्पन हो रही है। प्रगति होना आवयश्क है, लेकिन प्रकृति को नुकसान पहुंचा कर प्रगति विनाश का कारण बन सकती है। प्रदेश में पर्यावरण की दृष्टि से प्लास्टिक (Plastic) को प्रतिबंधित किया गया है। सीएम ने कहा कि एनडीआरएफ (NDRF) बटालियन स्थापित की जा रही है, जिससे आपदा की स्थिति से निपटा जाएगा। स्टूडेंट एजुकेशनल एण्ड कल्चरल मूमेंट आॅफ लद्दाख के अध्यक्ष सोनम वांगचुक ने हिमाचल प्रदेश द्वारा पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में किए गए महत्वाकांक्षी उपायों की सराहना की ।उन्होंने जलवायु साक्षरता की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि आपदाओं को रोकने के लिए समय पर सार्थक कदम उठाए जाने चाहिए। शैक्षणिक शोध संस्थानों में स्थानीय क्षेत्रों से सम्बन्धित चुनौतियों का अध्ययन किया जाना चाहिए।

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