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कॉप-26 में विकसित देशों पर गरजने वाले PM मोदी, ग्लासको घोषणा पत्र से आखिर क्यों हटे पीछे, जानें वजह 

भारत ने 2070 तक कार्बन उत्सर्जन खत्म करने पर जताई है अपनी प्रतिबद्धता 

कॉप-26 में विकसित देशों पर गरजने वाले PM मोदी, ग्लासको घोषणा पत्र से आखिर क्यों हटे पीछे, जानें वजह 

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नई दिल्ली। दुनिया (World) को बचाने के लिए यूरोपीय देश स्कॉटलैंड (Scottland) के ग्लासकों में मंथन हुआ। इसे कॉप-26 नाम दिया गया है। तीन नवंबर को ग्लासकों में दुनिया को संबोधित करते हुए पीएम मोदी (PM Modi) ने जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग और कार्बन उत्सर्जन को कम करने को लेकर अपनी बात रखी थी। इस सम्मेलन में उन्होंने विकसित देशों को जमकर लताड़ा था। विकासशील और छोटे द्वीप देशों पर मंडरा रहे खतरे को लेकर चिंता भी जाहिर की थी। भारत ने खुद 2070 तक कार्बन उत्सर्जन खत्म करने को लेकर अपनी प्रतिबद्धता भी जाहिर की। लेकिन अब ग्लासको से एक महत्वपूर्ण खबर निकल कर सामने आ रही है। दुनिया के वनों से भरपूर देशों में शामिल भारत ने कॉप-26 में एक मसौदे पर अपनी दूरी बना ली। जिसे लेकर सौ से अधिक देश के नेता वनों को बचाने का संकल्प ले चुके हैं।

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1980 वन अधिनियम में बदलाव की संभावना 

दरअसल, भारत अपनी विकास की गाड़ी को रफ्तार देने के लिए वन संरक्षण अधिनियम 1980 में बदलाव लाने पर विचार कर रहा है। अगर भारत इस ग्लासको में प्रस्तावित वन समझौते का हिस्सा बन जाता, तो भारत के विकास की गाड़ी पर ब्रेक लगने की संभावना थी। बता दें कि बीते दो अक्टूबर को केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने एक पत्र जारी किया था। इसमें वन संरक्षण अधिनियम, 1980 में बदलाव को लेकर 14 संभावित बिंदुओं पर विचार किया गया है। इसमें वनों की कटाई कम करने की दिशा में यह कानून बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसके तहत वनों का कोई अन्य इस्तेमाल करने के लिए केंद्र सरकार से अनुमति लेनी पड़ती है।

इस मामले में भारतीय प्रतिनिधि ने मीडिया को बताया कि भारत ने इस घोषणा-पत्र के तैयार मसौदे में आधारभूत संरचनात्मक विकास संबंधी गतिविधियों को वन-संरक्षण से जोड़े जाने से नाखुश होने के चलते यह फैसला लिया है। कॉप-26 के इस मसौदे में स्थायी उत्पादन और खपत, बुनियादी ढांचे के विकास, व्यापार के साथ-साथ वित्त और निवेश के संबंधित क्षेत्रों में परिवर्तनकारी कार्रवाई को भी जोड़ा गया है।

उन्होने कहा कि भारत का इस बारे में मानना है कि विश्व और राष्ट्रीय स्तर पर भविष्य में भूमि उपयोग, जलवायु, जैव विविधता और सतत विकास लक्ष्यों को पूरा करने के लिए, स्थायी उत्पादन और खपत, बुनियादी ढांचे के विकास, व्यापार, वित्त, निवेश और छोटे के साझीदारों लिए आपस में जुड़े क्षेत्रों में परिवर्तनकारी कार्रवाई की आवश्यकता होगी। इसमें अपनी आजीविका के लिए जंगलों पर निर्भर स्वदेशी लोग और स्थानीय समुदाय महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। वहीं, उन्होंने कहा कि भारत इस मसौदे के लिए इसलिए स्वीकार्य नहीं था, क्योंकि यह मामला विश्व व्यापार संगठन के अधीन है।

आखिर इस मसौदे में ऐसा है क्या?

जब दो नवंबर को दुनिया जलवायु समर्थन के मुद्दे को लेकर माथापच्ची करने बैठी। तो दुनिया के शीर्ष नेताओं ने 2030 तक वनों की कटाई और भूमिक्षरण को रोकने के लिए 19 बिलियन डॉलर के सार्वजनिक और निजी फंड के सपोर्ट में हाथ उठाए। यही भारत का मसौदे से दूरी बनाए रखने का मुख्य कारण है। बता दें कि भारत विकास की गति को धार देने के लिए वनों का उचित दोहन करना चाहता है। इधर, ये नेता दुनिया के वनों के कुल 10वें हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं। ग्लासको में दुनिया के इन नेताओं ने घोषणा को वैश्विक वनों की रक्षा में ‘सबसे बड़ा कदम’ बताया गया। कनाडा से लेकर रूस ने अपने तायगा वनों और ब्राजील के उष्णकटिबंधीय बर्षा वनों तक, कोलंबिया, इंडोनशिया से लेकर कांगो गणराज्य ने ग्लासगो में ‘वन और भूमि के उपयोग संबंधी घोषणपत्र’ का समर्थन किया।

क्या बोले ब्रिटिश पीएम बोरिस जॉनसन 

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने इस मसौदे पर अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि कॉप-26 में दुनिया के नेताओं ने धरती के वनों को बचाने और उनके संरक्षण के लिए ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं।

इस प्रोजेक्ट से जुड़े ब्रिटिश सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, ‘इस प्रयास के महत्व को समझने के लिए आपको वचनबद्ध पूंजी की प्रतिबद्धता और उसकी संरचना को देखना होगा। निजी पूंजी होने के बावजूद लोकनिधि ज्यादा प्रभावी रहती है। इसके अलावा, वित्त पोषण की एक निश्चित समय सीमा है। यह मॉडल उत्सर्जन में कमी को लेकर अन्य क्षेत्रों में अग्रणी बन सकता है’।

कहां से आएंगे पैसे 

घोषणा-पत्र को अमल में लाने के लिए खर्च होने वाले लगभग 19 बिलियन डॉलर में 12 बिलियन डॉलर जनता के सहयोग से ही जुटाएं जाएंगे। इसमें ब्रिटेन समेत 12 देश शामिल हैं। इसके लिए 2021 से लेकर 2025 तक की समय-सीमा तय की गई है। इसके अलावा निजी क्षेत्र की तीस से अधिक वित्तीय संस्थाओं से भी 7.2  बिलियन डॉलर जुटाए जाएंगे। इस पूंजी का इस्तेमाल विकासशील देशों में क्षरित भूमि को संग्रहित करने, जंगल में आग लगने की घटनाओं को काबू में करने के लिए और मूल समुदायों के अधिकारों को समर्थन देने में किया जाएगा।

कोलंबियन राष्ट्रपति ने कही महत्वपूर्ण बात 

वहीं, विकासशील देश में शामिल कोलंबिया के राष्ट्रपति इवान डुक्यू ने कहा, ‘ ग्लासगो में ‘वन और भूमि के उपयोग संबंधी घोषणापत्र’ का हिस्सा बनकर कोलंबिया गौरवांवित है। यह घोषणपत्र’ अगले दशक में दुनिया के देशों के लिए वन संरक्षण और भूमि-क्षरण को रोकने की दिशा में ऐतिहासिक समझौता है। हम 2030 तक वनों की कटाई पूरी तरह से रोकने और अपनी भूमि और महासागरीय संसाधनों के 30 फीसद की रक्षा करने की प्रतिबद्धता को कानूनी तौर पर स्थापित करेंगे।’

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