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इस गांव में किसी भी घर में नहीं जलता चूल्हा, फिर भी कोई नहीं रहता भूखा
Chandanki village of Gujarat: एक गांव ऐसा ..जहां किसी के घर में चूल्हा नहीं ….फिर भी सभी गांववासी एक साथ बैठकर खाना खाते है और कोई भूखा भी नहीं रहता… ये कोई पहेली नहीं जनाब हमारे देश के एक गांव की बात हो रही है। समय के साथ बेशक परंपराएं बदल गई हो पर आज भी कुछ गांव अपनी पुरानी अनूठी परंपराओं और संस्कृति को सहेजे हुए। हमारे देश के गुजरात राज्य में एक ऐसा गांव है जहां लोग अपने-अपने घरों में खाना नहीं बनाते हैं। इस गांव में पूरा खाना एक ही जगह यानी रसोई में बनता है और फिर सभी लोग एक साथ बैठकर उसे खाते हैं।
सरपंच पूनम भाई पटेल ने की थी शुरुआत
गुजरात के छोटे से गांव चांदनकी में लोग एक साथ बैठकर सिर्फ खाना ही नहीं खाते, बल्कि एक-दूसरे के साथ समय बिताते हैं। अपने दिल की बात भी कहते- सुनते हैं। लगभग 1000 लोगों की आबादी वाले इस चांदनकी गांव में सामुदायिक रसोईघर की अनूठी परंपरा प्रचलित है। चलिए जानते हैं कि इस अनोखी व्यवस्था की शुरुआत कैसे हुई। कहते हैं कई साल पहले, जब गांव के युवा शहरों और विदेशों में बसने लगे तो गांव में बुजुर्गों की संख्या बढ़ गई। हर घर के लिए अलग-अलग खाना बनाना मुश्किल हो गया। इसी समस्या को समझते हुए गांव के सरपंच पूनम भाई पटेल ने एक नया और अलग विचार दिया। पूनम भाई पहले करीब 20 साल तक न्यूयॉर्क में रह चुके थे। वहां के जीवन और सुविधाओं को देखकर उन्होंने सोचा कि क्यों ना गांव में भी एक ऐसी व्यवस्था बनाई जाए जहां लोग अकेले ना रहें। उन्होंने सुझाव दिया कि पूरे गांव के लिए एक ही रसोई और एक ही खाने का हॉल बनाया जाए, जहां सभी लोग साथ बैठकर खाना खाएं।
रोज पारंपरिक गुजराती खाना बनता यहां
चांदनकी गांव में एक केंद्रीय रसोई में रोज पारंपरिक गुजराती खाना बनता है। खाना घर जैसा ही हेल्दी और टेस्टी होता है। लोग हर महीने लगभग 2000 का योगदान देते हैं और इसके बदले उन्हें रोज दो समय का खाना मिलता है। रसोई में काम करने वाले रसोइयों को लगभग 11,000 की सैलरी दी जाती है, जिससे यह व्यवस्था टिकाऊ भी बन जाती है। गांव का सामुदायिक हॉल पूरी तरह एयर कंडीशन्ड है और सोलर पैनल से चलता है. यह जगह सिर्फ खाने के लिए नहीं है, बल्कि बातचीत और रिश्तों को मजबूत करने की जगह बन गई है। यहां लोग साथ बैठकर खाना खाते हैं और अपने जीवन की बातें शेयर करते हैं। गांव के लोग मानते हैं कि यहां कोई अकेला नहीं है। एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ देने की परंपरा ने पूरे गांव को एक परिवार बना दिया है।
पंकज शर्मा
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