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अब पी सकेंगे समुद्र का पानी, पर्यावरण के अनुकूल तकनीक विकसित
क्या आपने कभी प्यास बुझाने के लिए समुद्री जल पीने के साथ साथ ऊर्जा बचाने के बारे में सोचा है। हालांकि यह बहुत सामान्य नहीं लगता है, लेकिन भविष्य में यह एक वास्तविकता होगी। आईआईटी गांधीनगर के शोधकर्ताओं को इसमें काफी कामयाबी मिली है। आईआईटी की एक टीम ने लागत प्रभावी और पर्यावरण के अनुकूल पानी विलवणीकरण तकनीक विकसित की है। यह समुद्री जल को पीने योग्य बनाने के लिए प्राकृतिक प्रसंस्करण से 99 फीसदी से अधिक
नमक आयनों और अन्य अशुद्धियों को सफलतापूर्वक हटा सकती है।
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आईआईटी जीएन के अनुसार, यह पहली ऐसी विधि है जो ग्रेफाइट की संरचनात्मक अखंडता को नुकसान पहुंचाए बिना जलीय घोल के अंदर ग्रेफाइट को नियंत्रित कर सकती है। इन निष्कर्षों को हाल ही में एक अंतरराष्ट्रीय जर्नल नेचर कम्युनिकेशंस में रिपोर्ट किया गया है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डबल्यूएचओ) की एक रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया की आबादी का लगभग पांचवां हिस्सा ऐसे क्षेत्रों में रहता है जहां पीने के साफ पानी की कमी है। जनसंख्या में निरंतर वृद्धि और भारी ऊर्जा मांगों ने पारंपरिक स्वच्छ जल संसाधनों पर अत्यधिक दबाव डाला है। इसके अलावा अलवणीकरण के लिए व्यापक रूप से उपयोग की जाने वाली रिवर्स ऑस्मोसिस (आरओ) तकनीक महंगी है, अधिक पानी बर्बाद करती है और अत्यधिक ऊर्जा-गहन है। इसके लिए आमतौर पर 60-80 बार के हाइड्रोस्टेटिक दबाव की आवश्यकता होती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, पीने योग्य पानी की बढ़ती मांग और लगातार सिकुड़ते मीठे पानी के संसाधनों के साथ अधिक से अधिक देशों http://पानी कीको जरूरतों को पूरा करने के लिए समुद्री जल के विलवणीकरण की ओर रुख करना होगा। इन मुद्दों का एक वैकल्पिक और किफायती समाधान खोजने के लिए आईआईटी जीएन भौतिकी और सामग्री इंजीनियरिंग के प्रोफेसर गोपीनाधन कलों के नेतृत्व में एक शोध दल ने विद्युत क्षेत्र और पोटेशियम क्लोराइड आयन की मदद से ग्रेफाइट क्रिस्टल (Graphite Crystal) में नियंत्रणीय जल परिवहन चैनल बनाए। यह चैनल क्रिस्टल के माध्यम से केवल ताजे पानी को स्थानांतरित करता है और सभी नमक आयनों को अवरुद्ध कर देता है।
शोध दल में पीएचडी विद्वान ललिता सैनी, अपर्णा राठी, सुविज्ञा कौशिक और एक पोस्टडॉक्टरल फेलो शिव शंकर नेमाला शामिल हैं। यह शोध पेड़ों द्वारा किए जाते पानी के प्राकृतिक सेवन से प्रेरित है जो केशिका प्रभाव का उपयोग करता है। अणुओं और आयनों का चयनात्मक परिवहन आमतौर पर जैविक प्रणालियों में देखा जाता है। इन जैविक चैनलों की नकल करने से अत्यधिक कुशल फिल्टरेशन सिस्टम (Filtration System) बन सकते हैं।
आईआईटी के शोध दल ने तकनीक में केशिका प्रक्रिया का उपयोग किया, जिसमें कोई ऊर्जा खर्च नहीं होती है और वास्तव में पानी का वाष्पीकरण बिना किसी बाहरी दबाव के अनायास ही हो जाता है। वाष्पीकरण दर ने नैनोस्केल चैनलों के अंदर मौजूद केशिका और अन्य बलों से उत्पन्न होने वाले 50-70 बार का एक बैक-केल्क्युलेटेड दबाव प्रदान किया।
भविष्य के अनुप्रयोगों में इस नवाचार के महत्व और उपयोगिता के बारे में बताते हुए, प्रो गोपीनाधन कलों ने कहा, हमारी विधि केवल ग्रेफाइट तक ही सीमित नहीं है बल्कि बड़ी संख्या में स्तरित सामग्री, जैसे मिट्टी, के उच्च प्रदर्शन पृथक्करण अनुप्रयोगों के लिए खोजी जा सकती है। प्रचुर मात्रा में समुद्री जल और उपयुक्त प्लान्ट डिजाइन के अनुकूलन के साथ, हमारी पद्धति दुनिया मैं सभी के लिए पीने के पानी के सपने को साकार करने में एक उज्जवल भविष्य रखती
है।
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इसके अलावा यह तकनीक गैस शुद्धिकरण, ईंधन सेल में प्रोटॉन एक्सचेंज, रासायनिक पृथक्करण, कचरे से कीमती धातु निकालना आदि के लिए फिल्टर डिजाइन करने में भी उपयोगी साबित हो सकती है। यह डीह्यूमिडिफिकेशन अनुप्रयोगों के लिए भी उपयुक्त हो सकती है क्योंकि विस्तारित ग्रेफाइट में उच्च जल वाष्पीकरण दर होती है।
पेपर की फस्र्ट ओथर ललिता सैनी ने कहा कि प्राकृतिक ग्रेफाइट पानी या प्रोटॉन सहित किसी भी आयन को अवशोषित नहीं करता है। हालांकि, इसकी प्रकृति से, ग्रेफाइट क्रिस्टल किसी भी पानी के अणुओं को अपने अंदर से भी गुजरने की इजाजत नहीं देता है क्योंकि उसमे इन अणुओं के परिवहन के लिए पर्याप्त जगह नहीं है। इस समस्या को एक विद्युत क्षेत्र का उपयोग करके और उसमें पोटेशियम क्लोराइड आयनों को डालने से हल किया गया था। यह ग्रेफाइट क्रिस्टल के अंदर कुछ जगह बनाते हैं और पानी के अणुओं के आसान मार्ग के लिए एक स्थिर संरचना प्रदान करते हैं। साथ ही साथ किसी भी नमक के आयन को बाधित कर देता हैं, ऐसे हमे पीने योग्य पानी मिलता हैं।
शोधकर्ताओं ने पाया कि यह तकनीक आत्मनिर्भर है और समुद्र के पानी से 99 प्रतिशत से अधिक नमक आयनों और अन्य अशुद्धियों को सफलतापूर्वक निकाल सकती है। इससे यह पीने के लिए पूरी तरह से सुरक्षित हो जाता है। इसके अलावा, ग्रेफाइट जैसी कार्बन सामग्री रोगाणुरोधी होती है, जिससे अलवणीकरण प्रक्रिया में आवश्यक फिल्टर की संख्या कम हो जाती है। कार्बन प्रकृति में प्रचुर मात्रा में है और भारत दुनिया में ग्रेफाइट का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। वर्तमान प्रयोग में प्राकृतिक ग्रेफाइट का उपयोग किया गया है। हालांकि, टीम एक ऐसी विधि भी तैयार कर रही है जिसमें प्राकृतिक ग्रेफाइट के उपयोग की आवश्यकता नहीं होती है इसके बजाय, वे कचरे, प्लास्टिक, गेहूं, चीनी, चॉकलेट आदि से ग्रेफीन (ग्रेफाइट की एक-इकाई परत) को संश्लेषित कर सकते हैं और इसे ग्रेफाइट जैसी संरचना बनाने के लिए इकट्ठा कर सकते हैं।
अनुसंधान दल द्वारा बनाए गए वर्तमान 2 मिमी गुणा 2 मिमी आकार के उपकरण में आर ओ तकनीक जितना ही प्रवाह दर है, वह भी बिना बिजली का उपयोग किए, लेकिन इसमें कम प्रोसेस फिल्टर शामिल हैं, इससे पानी की बबार्दी भी कम होने की उम्मीद है। इस तकनीक में उपयोग की गई जल वाष्पीकरण और वॉटर फिल्टरेशन प्रक्रियाओं में किसी भी प्रकार की बिजली का उपयोग नहीं होता है और इसलिए यह कोई भी गैस उत्सर्जन का उत्पादन नहीं करती है। इससे यह पर्यावरण के अनुकूल हो जाती है। टीम अब इस तकनीक का उपयोग करके डायरेक्ट पॉइंट-ऑफ-यूज वॉटर फिल्टर को विकसित करने के लिए काम कर रही है ताकि इसे आम जनता के लिए सुलभ बनाया जा सके।