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हिमाचल हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने किया निरस्त, तथ्यों के विपरीत बताया निर्णय

बीपीएल परिवार के सदस्य को पुलिस कांस्टेबल पद पर नियुक्ति के दिए आदेश

हिमाचल हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने किया निरस्त, तथ्यों के विपरीत बताया निर्णय

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शिमला। हिमाचल हाईकोर्ट (Himachal High Court) के निर्णय को निरस्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बीपीएल परिवार के सदस्य (BPL Family Member) को पुलिस कांस्टेबल के पद पर नियुक्त करने के आदेश दिए है। हिमाचल हाईकोर्ट के निर्णय को निरस्त करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि हाईकोर्ट का निर्णय तथ्यों के विपरीत है। सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court ) ने कहा कि डीआईजी (DIG) द्वारा दायर शपथ पत्र से यह स्पष्ट है कि अपीलकर्ता संदीप कुमार बीपीएल परिवार का सदस्य है। यह दर्जा उसे वर्ष 2005 में दिया गया और आज तक जारी है। अपीलकर्ता ने ऑनलाइन फॉर्म के साथ दिनांक 16 जून, 2017 को सचिव, नगर पंचायत नादौन जिला हमीरपुर द्वारा जारी प्रमाण पत्र अपलोड किया था। जो यह दर्शाता है कि अपीलकर्ता अन्य पिछड़ा वर्ग से संबंधित है और परिवार को शहरी गरीब का दर्जा दिया गया है।

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प्रतिवादी के अधिवक्‍ता ने कोर्ट के ध्‍यान में शहरी गरीब पहचान पत्र के प्रमाण पत्र में पंक्ति सं. 2 की ओर दिलाया जिसमें शहरी गरीब परिवार संख्या 261/बीपीएल/एनपी/एनडीएम/05″ के रूप में लिखा था। कोर्ट ने कहा कि पढ़ने में उक्त पंक्ति का अर्थ यह नही है कि जिस समय यह प्रमाण पत्र जारी किया था उस समय वह गरीबी रेखा से नीचे की श्रेणी में नही था। उक्त पंक्ति केवल परिवार शहरी गरीब के रूप में दिए गए पंजीकरण को संदर्भित करती है। इसके अलावा अपीलकर्ता ने एक अन्य प्रमाणपत्र के लिए आवेदन किया था, जिसे बाद में 31.10.2019 को जारी किया गया था। यह प्रमाण पत्र अपीलकर्ता ने दिनांक 21.10.2019 का कॉल लेटर प्राप्त होने के बाद पेश किया था। उच्च न्यायालय ने याचिका को इस आधार पर खारिज कर दिया था कि प्रार्थी ने बीपीएल कैटेगरी को लेकर सही दस्तावेज नहीं लगाए थे।

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उच्च न्यायालय के अनुसार परमानेंट बीपीएल कार्ड (BPL Card) के आधार पर प्रार्थी भर्ती के लिए योग्य नहीं था। जबकि उच्च न्यायालय के समक्ष प्रदेश सरकार ने खुद कहा था कि प्रार्थी चयन प्रक्रिया के समय बीपीएल कैटेगरी में था। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि जब प्रार्थी बीपीएल कैटेगरी में था तथा उच्च न्यायालय के समक्ष इस प्रकार का व्यक्तव्य दिया गया था तो उच्च न्यायालय को उसकी याचिका को खारिज नहीं करना चाहिए था। सुप्रीमकोर्ट ने कहा कि इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट का याचिका को खारिज करना सही नही था। सुप्रीमकोर्ट ने पाया कि अपीलार्थी ने 52 अंक प्राप्त किए और योग्यता सूची के अनुसार उसे चयनित किया जाना था। सुप्रीमकोर्ट ने दो माह के भीतर प्रार्थी को नियुक्ति पत्र जारी करने के आदेश जारी किए। साथ ही वरिष्ठता पिछली तारिख से ही दिए जाने के आदेश जारी किए।

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