-
Advertisement
दाढ़ी में छुपाकर लाए गए थे 7 बीज, जानिए भारत में कॉफी के 350 साल पुराने इतिहास की कहानी
International Coffee Day: हर साल 1 अक्टूबर को दुनिया भर के कॉफी प्रेमी ‘अंतरराष्ट्रीय कॉफी दिवस’ (International Coffee Day) मनाते हैं। इस खास दिन की शुरुआत साल 2015 में इटली के मिलान शहर से हुई थी, जिसकी घोषणा अंतरराष्ट्रीय कॉफी संगठन ने 2014 में कॉफी उत्पादक किसानों को समर्थन देने के इरादे से की थी। आज भारत समेत पूरी दुनिया में सुबह की शुरुआत गरमा-गरम कॉफी के बिना अधूरी मानी जाती है। चाहे दक्षिण भारत की मशहूर ‘फिल्टर कॉफी’ हो या शहरों के कैफे में मिलने वाली ‘कैपुचीनो’, कॉफी हर भारतीय के जीवन का अहम हिस्सा बन चुकी है।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि चाय के लिए मशहूर भारत में कॉफी का इतिहास लगभग 350-400 साल पुराना है और इसकी शुरुआत सिर्फ 7 बीजों से हुई थी? आइए जानते हैं भारत में कॉफी के आगमन से लेकर इसके विशाल उद्योग बनने तक की पूरी कहानी:
दाढ़ी में छुपाकर लाए गए थे 7 बीज
बात 17वीं शताब्दी (लगभग 1670 ईस्वी) की है। उस समय कॉफी के उत्पादन और व्यापार पर यमन समेत अरब देशों का एकछत्र राज था। यमन का ‘मोचा’ (Mocha) बंदरगाह इसका मुख्य केंद्र था। अरब लोग नियमों को लेकर इतने सख्त थे कि भुने हुए या उबले बीजों के अलावा हरा पौधा या कच्चा बीज देश से बाहर ले जाने पर पूरी तरह पाबंदी थी, ताकि कोई दूसरा देश इसे उगा न सके।
इसी दौरान कर्नाटक के चिकमगलूर के रहने वाले सूफी संत हजरत बाबा बुदन मक्का हज यात्रा पर गए। वापसी में वे यमन के मोचा शहर में रुके, जहां उन्होंने पहली बार कॉफी का स्वाद चखा। इसके स्वाद और ऊर्जा देने वाले गुणों से प्रभावित होकर वे इसे भारत लाना चाहते थे। कड़े नियमों से बचने के लिए उन्होंने एक साहसिक कदम उठाया और कॉफी के 7 हरे कच्चे बीजों को अपनी लंबी और घनी दाढ़ी में छुपाकर भारत ले आए (इस्लाम में 7 का अंक पवित्र माना जाता है)।
कर्नाटक में रोपे गए पहले पौधे
भारत लौटकर बाबा बुदन ने कर्नाटक के चिकमगलूर की चंद्रद्रोण पहाड़ियों पर उन 7 बीजों को रोप दिया। वहां की मिट्टी और मौसम कॉफी के लिए बेहद अनुकूल साबित हुए और देखते ही देखते वे बीज हरे-भरे पौधों में बदल गए। संत बाबा बुदन के इस योगदान का सम्मान करने के लिए उन पहाड़ियों का नाम ‘बाबा बुदन गिरी’ रख दिया गया।
18वीं सदी से commercial खेती और अनोखा Shade-Grown सिस्टम
PIB के अनुसार, 18वीं सदी में इसके व्यावसायिक बागान लगाए गए और 19वीं सदी में बड़े पैमाने पर खेती शुरू हुई। भारतीय कॉफी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे सीधे धूप में नहीं, बल्कि घने और फलीदार पेड़ों की छांव में (Shade-grown) उगाया जाता है। यह दो-लेवल वाला शेड सिस्टम मिट्टी की सेहत और जैव विविधता (Biodiversity) को बनाए रखता है। वर्तमान में पश्चिमी-पूर्वी घाटों और उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों के लगभग 4.91 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में इसकी खेती की जाती है।
दक्षिण भारत बना कॉफी का गढ़ (96% उत्पादन)
आज देश में उत्पादित कुल कॉफी का लगभग 96% हिस्सा केवल दक्षिण भारत के 3 राज्यों से आता है:
कर्नाटक: देश के कुल उत्पादन का लगभग 70% हिस्सा अकेले कर्नाटक पैदा करता है। चिकमगलूर, कूर्ग (कोडागु) और हसन इसके मुख्य केंद्र हैं।
केरल: यह दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है, जो देश की लगभग 20% कॉफी पैदा करता है (मुख्य क्षेत्र: वायनाड और त्रावणकोर)।
तमिलनाडु: तीसरे नंबर पर तमिलनाडु आता है, जहां 5% से 6% उत्पादन होता है (मुख्य क्षेत्र: नीलगिरी, येरकाड और डिंडीगुल)।
भारत में मुख्य रूप से दो प्रकार की कॉफी उगाई जाती हैं—अराबिका (Arabica) और रोबस्टा (Robusta)।
20 लाख से अधिक लोगों की आजीविका
भारतीय कॉफी उद्योग आज ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक मजबूत स्तंभ है। यह सेक्टर खेती, प्रोसेसिंग और व्यापार के माध्यम से 2 मिलियन (20 लाख) से अधिक लोगों को रोजगार देता है। इसमें छोटे किसानों का दबदबा है, जिनकी हिस्सेदारी कुल जोत की 99% और कुल उत्पादन की 70% है।
1942 में हुई ‘कॉफी बोर्ड ऑफ इंडिया’ की स्थापना
कॉफी उद्योग को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार ने ‘कॉफ़ी एक्ट VII ऑफ़ 1942’ लागू किया, जिसके तहत वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में ‘कॉफ़ी बोर्ड ऑफ़ इंडिया’ (Coffee Board of India) का गठन किया गया। 33 सदस्यों वाला यह बोर्ड रिसर्च और डेवलपमेंट के जरिए पूरी कॉफ़ी वैल्यू चेन को सपोर्ट और विकसित करने का काम करता है।
पंकज शर्मा
