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ब्रह्मदेव ने सहस्त्र दिव्य वर्षों तक किया था तप, तब प्रसन्न हुए थे नारायण

भगवान ने अपने संकल्प से सृष्टि रचयिता के ह्रदय में संपूर्ण वेद ज्ञान का प्रकाश करवाया

ब्रह्मदेव ने सहस्त्र दिव्य वर्षों तक किया था तप, तब प्रसन्न हुए थे नारायण

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सनातन धर्म (Sanatan Dharm) में ब्रह्मा (Brahma) को सृष्टि का रचियता माना गया है। यानी इस संसार की रचना ब्रह्मा ने की थी। भगवान विष्णु (Lord Vishnu) संसार की पालन पोषण करते हैं और शिव भोलेनाथ विनाश करते हैं। इसलिए शिव भोलेनाथ को महाकाल का नाम भी दिया गया है। क्या आपको पता है कि ब्रह्मदेव की उत्पत्ति कैसे हुई थी। ब्रह्मदेव मनुष्यों के आदि पिता मनु के भी पिता होने पर परम पिता कहलाते हैं। ब्रह्मदेव की उत्पत्ति भगवान नारायण के नाभि कमल से हुई थी। ब्रह्मदेव त्रिदेवों में शामिल हैं। पौराणिक कथाओं और शास्त्रों के अनुसार पहले पूरा संसार जल में डूबा हुआ था। उस समय भगवान नारायण (Lord Narayan)  देव शेष शैय्या पर लेटे हुए थे। जब सृष्टि की रचना का समय आता तो भगवान नारायण की नाभि से एक प्रकाशमान कमल प्रकट हो गया। उसी कमल से वेद मूर्ति ब्रह्माजी प्रकट हो गए। तब उन्होंने चारों ओर देखा तो कोई लोक नहीं दिखा। तब वह कमल का आधार का पता लगाने के लिए नाल से होते हुए जल में जा पहुंचे।

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यहां पर भी उन्हें कुछ पता नहीं चला। अंततः वह फिर से कमल (Lotus) पर लौट आए। तभी उन्हें अव्यक्त वाणी से तप करने की आज्ञा मिली। इसके बाद ब्रह्मदेव सहस्त्र दिव्य वर्षों तक तपस्या में लीन रहे। भगवान उनकी तपस्या से प्रसन्न हो गए और उन्हें दर्शन देकर अपने लोक का भी दर्शन करवाया। भगवान नारायण ने इसके पश्चात चार मुख वाले ब्रह्मा जी को भागवत तत्व का उपदेश चार श्लोकों में दिया। इन्हें चतुःश्लोकी भागवत कहा जाता है। इसके बाद ब्रह्मा जी ने अविचल समाधि के माध्यम से उस सिद्धांत को पूरी निष्ठा के साथ करने की बात कही। इसका कारण यह था कि अलग-अलग कल्पों में सृष्टि रचना करते रहने पर भी उनका मोह भंग ना हो। फिर भगवान ने अपने संकल्प से ही ब्रह्मा जी के ह्रदय में संपूर्ण वेद ज्ञान का प्रकाश कर दिया। पुराणों में बताया गया है कि ब्रह्मा जी के चार मुख हैं। उनके चार हाथ (four hands) हैं। इनसे वे वरमुद्रा, अक्षर सूत्र तथा कमंडल धारण किए हुए हैं। सृष्टि की रचना के लिए उन्होंने सबसे पहले चार पुत्रों सनक, सनन्दन, सनातन और सनतकुमार की उत्पत्ति की। अपने शरीर के अंशों से ही उन्होंने मनु व शतरूपा की उत्पत्ति की जिनसे फिर मनुष्य की उत्पत्ति हुई।

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