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खतरे की घंटी: हमें और आपको अंधेरे में रख रही हैं दुनिया भर की सरकारें, हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं

क्लाइमेंट चेंज के चलते कई द्वीपीय देश डूबने के कगार पर हैं

खतरे की घंटी: हमें और आपको अंधेरे में रख रही हैं दुनिया भर की सरकारें, हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं

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नई दिल्ली। दुनिया (World) को बचाने के लिए यूरोपीय देश स्कॉटलैंड (Scottland) के ग्लासकों में मंथन हुआ। इसे कॉप-26 नाम दिया गया है। तीन नवंबर को ग्लासकों में दुनिया को संबोधित करते हुए पीएम मोदी (PM Modi) समेत दुनिया भर की कई सरकारों के प्रतिनिधियों ने जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग और कार्बन उत्सर्जन को कम करने को लेकर अपनी बात रखी थी। लेकिन, वह महज कागज पर बने उस ड्राइिंग की तरह है, जिसे आज तक धरातल पर उतारा ही नहीं गया है। बस उसका प्रजेंटेशन बनाकर दुनिया भर के लोगों को सरकारें मूर्ख बनाने का काम कर रही है। जिसके चलते दुनिया भर में क्लाइमेट तेजी से बदल रहे हैं।

 सांस लेने में दिक्कत

कनाडा में बीते मई-जून के महीने में हीट वेब की बात सामने आ रही थी। ठंड प्रभावित देश में गर्मी में तापमान 41 डिग्री तक पहुंच गया था। जंगलों में भीषण अग्निकांड की तस्वीरें रोज दुनिया भर की मीडिया में सुर्खियां बन रही थी। अब यह बात सामने आ रही है कि कनाडा में क्लाइमेट चेंज के कारण 70 साल की महिला को सांस लेने में परेशानी हुई। डॉक्टर्स के पास पहुंची तो वो बोले कि क्लाइमेट चेंज के कारण ऐसा हो रहा है। डॉक्टर ने कहा कि पर्यावरण को हो रहे नुकसान के बारे में भले आज लोग गंभीर ना हों, लेकिन सच ये है कि क्लाइमेट चेंज से भारी बीमारी फैलेगी।

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कितना गंध फैला रहे हैं जानिए

21 वीं सदी में दुनियाभर में हर साल 4000 करोड़ टन CO2 यानी कार्बन डाईऑक्साइ़ड का उत्सर्जन होता है। अगर 2050 तक इसे कम करके 500 करोड़ टन पर नहीं लाया गया तो धरती को तबाही से बचाने के लिए कोई नहीं होगा। बहरहाल, कार्बन उत्सर्जन करने के मामले में अमेरिका, चीन और भारत क्रमश पहले दूसरे और तीसरे पायदान पर है। सबसे अधिक अमेरिका 28 प्रतिशत कार्बन का उत्सर्जन करता है। जबिक, चीन 15 प्रतिशत और भारत 7 प्रतिशत कार्बन उत्सर्जन करता है।

सभी कर रहे महज दिखावा

अमेरिका सहित कई विकसित देश क्लाइमेट चेंज पर महज दिखावा कर रहे हैं। खासकर अमेरिका का कहना है कि वह दुनिया को बचाने के लिए सबसे आगे खड़ा है। बीते महीने अमेरिका में आई हीट वेव ने उसे भी क्लाइमेट चेंज पर सोचने को मजबूर कर दिया है। जर्मनी में आई बाढ़ से पूरे यूरोप के माथे पर सिकन की लकीरें आ गई है। चीन में फ्लैश फ्लड के चलते कई शहर डूब गए। जानकार बताते हैं कि, इन सब के बावजूद किसी देश ने अब तक ठोस कदम नहीं उठाया है।

2050 तक कार्बन नेट जीरो का लक्ष्य

लगातार बिगड़ते क्लाइमेट चेंज के कारण, दुनिया के सभी बड़े कार्बन छोड़ने वाले देशों से 2050 तक नेट जीरो करने को कहा जा रहा है। नेट जीरो मतलब देश में जितना भी कार्बन निकले, वो पूरा का पूरा वो देश खुद ही खत्म भी कर दे।

 नेट जीरो के लिए 2070 का टारगेट रखा है

भारत कह रहा है कि हमने दुनिया को तबाह नहीं किया है। बीते 170 साल में कुल कार्बन हवा में घोलने में हमारी सिर्फ 4% की भागीदारी है, इसलिए हम 2070 तक नेट जीरो करेंगे। लेकिन ये बातें भी सिर्फ बातें हैं, क्योंकि कार्बन को एब्जॉर्ब करने वाले जंगल 2017 से 2019 के बीच 66,000 हेक्टेयर कम हो गए हैं। यानी, भारत के कुल जंगल का 5% कम हो गया है। ऐसे में कार्बन कैसे कम होगा।

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