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सवाल 15वें Dalai Lama का, निकल रहा है रास्ता, जानने के लिए गहराई तक पढ़ें

सवाल 15वें Dalai Lama का, निकल रहा है रास्ता, जानने के लिए गहराई तक पढ़ें

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आज पूरी दुनिया एक ही सवाल का जवाब चाहती है, वो यह कि 14वें दलाई लामा यानी तेंजिन ग्यात्सो के बाद 15वें दलाई लामा कौन होंगे ? क्या इनसे पहले रहे 13 दलाई लामा की तरह ही तेंजिन ग्यात्सो भी अपने पुनर्जन्म को लेकर कोई संकेत देंगे ? या फिर कुछ ऐसा होने वाला है जिससे तिब्बत व चीन सहित पूरी दुनिया की तस्वीर बदल जाएगी। क्या दलाई लामा के नेतृत्व में शांतिपूर्ण ढंग से अहिंसा के मार्ग पर चल रहा तिब्बती आंदोलन दलाई लामा के बाद हिंसक हो जाएगा ? क्या होगा अगर 14वें दलाई लामा के बाद चीन अपनी तरफ से किसी को दलाई लामा घोषित कर दे ? क्या होगा तिब्बत का, क्या होगा तिब्बतियों का और क्या होगा तिब्बती आंदोलन का ? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब आज हर कोई जानना चाहता है। लेकिन जवाब है क्या ? इन्हीं सब सवालों के जवाब जानने के लिए हिमाचल अभी अभी ने बात की तिब्बती निर्वासित सरकार के पूर्व प्रधानमंत्री प्रोफेसर सामदोंग रिंपोछे से। हिमाचल अभी अभी के कांगड़ा स्थित मुख्यालय पहुंचे सामदोंग ने 15वें दलाई लामा को लेकर कुछ यूं कहा-


सवालः आपको दलाई लामा के बहुत करीब माना जाता है और आपको उन्होंने अपने दूत के रूप में भी नामित किया है, दलाई लामा के बाद तिब्बती आंदोलन का क्या होगा और पूरे सिस्टम पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा ?

जवाबः यह प्रश्न बहुत जटिल है और इसका सटीक उत्तर देना बहुत मुश्किल है। यह भविष्य की बात है और भविष्य के गर्भ में क्या है यह कोई नहीं कह सकता। जो भी भविष्य की बात करते हैं वे या तो अनुमान लगाते हैं या फिर वर्तमान की परिस्थितियों को देखते हुए कहते हैं कि इसका क्या परिणाम हो सकता है। इसलिए मैं इसका सटीक उत्तर नहीं दे सकता। आजकल मीडिया में यह लिखा जा रहा है कि दलाई लामा ने दो प्रतिनिधियों को नामित किया है, वह सही नहीं है। एक विशेष समूह अमेरिका से आया था, उनको दलाई लामा ने कहा था कि तुमने जो काम हाथ में लिया है उसे निरंतर करते रहो। जहां मैं नहीं पहुंच पाऊंगा वहां मेरे ये दो अनुयायी आपके साथ जाएंगे। यह एक विशेष कार्य के लिए विशेष समूह के लिए कहा गया था। इससे यह नहीं समझा जाना चाहिए कि दो प्रतिनिधि नामित हुए हैं। दलाई लामा 14वें दलाई लामा हैं। इनसे पहले 13 दलाई लामा हुए। हर दलाई लामा ने जब-जब अपना शरीर छोड़ा और जब तक पुनर्जन्म नामित नहीं होता उस बीच शून्यता आती रही है। जिसे धीरे-धीरे किसी तरह से व्यवस्थित कर के दूसरे दलाई लामा के आने पर उनके हाथ में नेतृत्व दे दिया गया और सब ठीक हो गया। 14वें दलाई लामा के जीवनकाल के साथ विशेष बात यह है कि हम अपने देश में नहीं हैं। तिब्बती समाज दो वर्गों में बंटा हुआ है। एक निर्वासित तिब्बती समाज और एक चीन के शासन के अंतर्गत पीड़ित समाज। इसलिए वर्तमान दलाई लामा के न रहने पर तिब्बती आंदोलन का क्या होगा, ऐसा सोचना बहुत कठिन है। चीन के शासकों का अनुमान है कि 14वें दलाई लामा के न रहने के बाद तिब्बती आंदोलन समाप्त हो जाएगा। केवल दलाईलामा के जीवित रहने तक ही तिब्बत का प्रश्न है। इसलिए वे दलाई लामा के जाने का उत्सुकता से इंतजार कर रहे हैं। उनके अनुमान की तरह ही बहुत से तिब्बती लोग भी यही सोचते हैं कि 14वें दलाई लामा के जाने के बाद हम अनाथ हो जाएंगे, कोई नेतृत्व नहीं रहेगा। एकजुटता करवाने वाला कोई नहीं होगा और हम लोग कुचले जाएंगे। इस बात को दलाई लामा ने 20-25 साल पहले ही सोच लिया था। इसलिए उन्होंने तिब्बती नेतृत्व को प्रजातंत्र की प्रणाली से निर्वाचित करने व बागडोर तिब्बती लोगों के हाथों में देने का निर्णय लिया। इसीलिए 2011 से अभी तक उसी हिसाब से चल रहे हैं। लेकिन उनकी छत्रछाया रहते हुए इसका रूप और है। उनका यह प्रयोग सफल होना चाहिए ऐसी आशा हम करते हैं। भविष्य के गर्भ में क्या है इसका अनुमान लगाना बहुत कठिन है। लेकिन संभावनाएं हैं।

प्रथम संभावना यह है कि 14वें दलाईलामा के जीवन काल में ही चीन के साथ कुछ ऐसे वार्तालाप के माध्यम से ही तिब्बत की समस्या का समाथान हो जाए और तिब्बती लोगों को अपने देश में रहने का अवसर मिले। दलाई लामा ने चीन के सामने एक प्रस्ताव रखा है, जिसके अनुसार चीन के संविधान में अल्पसंख्यक समुदायों को राष्ट्रीय, क्षेत्रीय स्वायत्तता के प्रावधान को ठीक ढंग से लागू किया जाए। अगर ऐसा किया जाता है तो सभी अल्पसंख्यक लोगों को सही और विश्वसनीय स्वायत्तता मिल जाएगी। उस स्वायत्तता के माध्यम से अपनी-अपनी भाषा, सांस्कृतिक रीति-रिवाज और ज्ञान-विज्ञान की परंपरा को सुरक्षित रखने और सहेजने का अवसर मिलेगा और इतना ही काफी है। राजनीतिक दृष्टि से उसे किसके अधीन लाया जाय और किसके नहीं यह अधिक महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि तिब्बती लोगों का एक दायित्व है और वह दायित्व यह है कि हमारी प्राचीन भारतीय सांस्कृतिक परंपरा है, भारतीय विज्ञान परंपरा है जो कि केवल तिब्बती भाषा में और तिब्बती लोगों के माध्यम से ही अब तक जीवित है और उसको जीवित रखने के लिए अगर स्वायत्तता मिल जाए तो हम उतने में ही अपना काम चला लेंगे। तो उस हिसाब से एक समाधान मिल जाता है । एक सही स्वायतता का शासन तिब्बतियों के हाथ में मिल जाए तब बहुत ज्यादा रिक्तता नहीं होगी, बहुत ज्यादा गड़बड़ नहीं होगी। फिर 14वें दलाईलामा के न रहने के बाद 15वें दलाई लामा को ढूंढ लिया जाएगा। फिर 24-25 साल बाद जब 15वें दलाई लामा की शिक्षा-दीक्षा पूरी हो जाएगी और वे अपना नेतृत्व संभालेंगे। दूसरी संभावना यह है कि अगर इनके जीवनकाल में तिब्बत की समस्या का कोई समाधान न मिले और जिस तरह चीन अभी चला रहा है, यह अगर निरंतर चलता रहे तो यह एक कठिन प्रश्न है। ऐसे में उस समय एक संभावना यह है कि अभी तक जो हम अहिंसक माध्यम से अपने उद्देश्य को प्राप्त करने की कोशिश कर रहे हैं उससे भटक जाएं, मंगोलिया की तरह हिंसक आंदोलन हो जाए और आतंकवाद या आंतरिक कलह की तरह उसे ले लें तो वह चीन व शेष जगत के लिए अच्छी बात नहीं होगी। इसलिए इस संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता। हम लोग अभी भी आशावान हैं कि 14वें दलाई लामा कम से कम 10-15 साल स्वस्थ रहेंगे और उनके जीवित रहते ही तिब्बती समस्या का कोई समाधान मिल जाए, जिससे तिब्बत, चीन व शेष जगत को एक नए किस्म का परिवर्तन चीन में दिखाई देने लगे। इसी आशा में हम लोग प्रयासरत हैं।

सवाल- 14वें दलाई लामा के बाद अगर चीन अपनी तरफ से किसी को दलाई लामा घोषित कर देता है तो उस परिस्थिति में क्या होगा ?

जवाब – वे प्रामाणिक नहीं होंगे। जैसे पंचेन लामा को चीन ने अपने स्तर पर घोषित किया है। उनको सरकारी अधिकारियों के अलावा न तो चीनी और न ही तिब्बती कोई मान्यता देते हैं। तिब्बतियों में तो उनकी कोई मान्यता है ही नहीं। केवल चीन की वजह से उनके आने पर थोड़ा स्वागत कर लेते हैं। अन्यथा उनकी कोई मान्यता नहीं है। पिछले तीन-चार सालों से उनका कोई वक्तव्य भी नहीं आ रहा। जो चीन सरकार चाहती है वह कर नहीं रहे। खास तौर से धार्मिक सम्मेलनों में, विदेशों में होने वाले बौद्ध सम्मेलनों में उनको ले जाने की कोशिश करते हैं, वह भी अब कम हो गया है। चीनी सरकार को उन पर अब भरोसा नहीं रहा कि वह अब सही ढंग से काम करेंगे। इसलिए दलाई लामा के विषय में यह काम चलेगा नहीं, क्योंकि 14वें दलाई लामा अपने जीवनकाल में ही यह घोषणा कर देंगे कि 15वां दलाई लामा होगा या नहीं। अगर होगा तो किस प्रकार से होगा। इसलिए चीन अपनी ओर से दलाई लामा घोषित करने में सक्षम नहीं होगा और अगर कर भी देगा तो उससे चीन को कोई लाभ होने वाला नहीं है और यह बात सब लोगों को शत-प्रतिशत मालूम है।

सवाल – आपने एक बात कही, कि दलाई लामा अपने जीवनकाल में 15वें दलाई लामा के बारे में कुछ संकेत दे जाएंगे। लेकिन इससे पहले भी जो दलाई लामा रहे वे संकेत देते रहे हैं। तो क्या 14वें दलाई लामा उससे हट कर कुछ ऐसा संकेत देंगे कि उनके जीवित होते हुए ही 15वें दलाई लामा की घोषणा कर दी जाए ?

जवाब – इसकी संभावना से इंकार नहीं कर सकते। पुनर्जन्म की टुलकू की पहचान करने की 3 विद्याएं हैं। 14वें दलाई लामा किसी को 15वां दलाई लामा घोषित कर सकते हैं, लेकिन इस ओर अभी कोई विचार नहीं हो रहा। उसकी संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता, लेकिन उस पर ऐसी कोई सोच अभी नहीं है। पुराने जमाने में केवल संकेत मात्र हुआ करता था। अब 14वें दलाई लामा शायद ज्यादा स्पष्ट रूप से निर्देशन देंगे।

सवाल – आपने कहा कि हो सकता है कि शून्यकाल के दौरान अहिंसक आंदोलन हिंसा की ओर चला जाएगा। क्या उस स्थिति में दलाई लामा के नेतृत्व में अहिंसा के मार्ग पर चल रहा आंदोलन अपने रास्ते से भटक नहीं जाएगा ?

जवाब – केवल भटक ही नहीं जाएगा बल्कि तिब्बती आंदोलन समाप्त हो जाएगा। हिंसा से कोई भी चीज प्राप्त नहीं की सकती। खासतौर पर तिब्बतियों की जनसंख्या चीन की जनसंख्या की तुलना में कुछ भी नहीं है। चीन में 54 अल्पसंख्यक जातिया हैं। उन सब की जनसंख्या मिलाकर चीन की जनसंख्या का केवल 4 प्रतिशत है। इतनी सी जनसंख्या का हिंसा व सैनिक क्षति तथा राजनीतिक दृष्टि से बहुत गलत होगा। उन्हें एक ही दिन में कुचल कर समाप्त कर दिया जाएगा। लेकिन लोगों की भावना इतनी आहत है कि साधारण इंसान दलाई लामा के नेतृत्व के बिना भी अहिंसा के मार्ग पर चल सकेंगे या नहीं, इस बात का संदेह बहुत लोगों को है।

सवाल – शून्यकाल के दौरान निर्वासित व तिब्बत में रह रहे तिब्बती मूल के लोगों का नेतृत्व कौन करेगा ?

जवाब – इस समय इसका कोई अनुमान नहीं है। दलाई लामा ने यह व्यवस्था दी है कि हर 5 साल बाद हम अपने नेतृत्व को प्रजातंत्र के माध्यम से निर्वाचित कर सकें। यही आशा करते हुए दलाई लामा ने यह प्रणाली लागू की है, लेकिन जैसा दलाई लामा के नेतृत्व का प्रभाव है उसकी तुलना में निर्वाचित नेतृत्व लोगों के दिलों में उतना प्रभावशाली नेतृत्व नहीं दे पाएंगे, ऐसा हमारे वर्तमान अनुभव से लग रहा है। लेकिन आशा यही है कि संभवतः दलाईलामा ने इसे इसी उद्देश्य से बनाया कि नेतृत्व में शून्यता न हो और अभाव न हो। इसलिए इसी पर हमें अब भरोसा करना है।

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