कुल्लू दशहरा में निभाई अनूठी परंपरा, प्रायश्चित के रूप में मनाया काहिका उत्सव

बारिश के बीच निकली भगवान नरसिंह की दूसरी जलेब

कुल्लू दशहरा में निभाई अनूठी परंपरा, प्रायश्चित के रूप में मनाया काहिका उत्सव

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कुल्लू। हिमाचल के कुल्लू जिला में आयोजित अंतरराष्ट्रीय देव महाकुंभ दशहरा (Kullu Dussehra) पर्व के तीसरे दिन आज एक अनूठी परंपरा काहिका का आयोजन किया गया। इस परंपरा में भगवान बिजली महादेव की अध्यक्षता में कुल 11 देवी-देवताओं ने भाग लिया। यह काहिका उत्सव (Kahika Festival) प्रायश्चित के रूप में मनाया जाता है, ताकि आज तक देव संस्कृति में जो भी भूल हुई हो, उनको समाप्त किया जा सके। बता दें कि काहिका उत्सव में नड़ जाति के व्यक्ति को देवताओं द्वारा पहले मूर्छित किया जाता है और उसके बाद उसे जिंदा किया जाता है। लेकिन इस काहिका में नड़ को मूर्छित नहीं किया गया, बल्कि नड़ द्वारा परिक्रमा की गई। साथ ही काहिका में अश्लील जुमलों का भी बोलबाला रहा। गत वर्ष दशहरा पर्व में देव परंपरा खंडित हुई थी और सिर्फ 8 देवी-देवताओं को ही दशहरा पर्व में बुलाया था। जिसके चलते देवी-देवता रुष्ट थे। इसके अलावा दो वर्ष पहले देव धुन का आयोजन किया गया था जिसमें भी देव परंपरा खंडित हुई थी और देवी-देवता रुष्ट थे। जिस कारण इस उत्सव का आयोजन करना पड़ा।


यह भी पढ़ें:दशहरा उत्सव: ढोल नगाड़ों की थाप पर निकली भगवान नरसिंह की भव्य जलेब

 

 

दशहरा उत्सव में पश्चाताप के लिए काहिका का किया आयोजन

जानकारी देते हुए रघुनाथ जी के प्रमुख छड़ीबरदार महेश्वर सिंह (Maheshwar Singh) ने बताया कि देव परंपरा के खंडित होने और देवी-देवता रुष्ट होने के बाद उसके निवारण के लिए काहिका का आयोजन किया गया। इससे पहले जब दशहरा पर्व में 1971 में गोलीकांड हुआ था तो उस समय भी उसकी शुद्धिकरण के लिए 1972 में काहिका का आयोजन किया था। वहीं विशेष जाति के नड़ ने बताया कि इससे पहले यहां पर काहिके का आयोजन कुल्लू में गोलीकांड के वक्त किया गया था। उस कार्यक्रम में मेरे पूर्वजों ने भूमिका निभाई थी। उन्होंने कहा कि काहिका शुद्धिकरण के लिए आयोजित किया जाता है। देवी-देवताओं के आह्वान पर इस परंपरा का आयोजन किया जाता है। दूसरी बार हैए जब ढालपुर में काहिके का आयोजन किया गया।

 

 

बारिश में निकली भगवान नरसिंह की दूसरी जलेब

रविवार को दशहरा उत्सव में काहिका विधि के पूरा होते ही बारिश शुरू हो गई। बारिश के बीच ही भगवान नरसिंह (Lord Narasimha) की दूसरी जलेब (Jalebe) निकली। वाद्ययंत्रों की थाप पर निकली जलेब को देखने के लिए बारिश में भी लोगों का उत्साह कम नहीं हुआ। जलेब में भगवान रघुनाथ के मुख्य छड़ीबरदार महेश्वर सिंह पालकी में भी सवार हुए। जलेब में सैंज घाटी के देवताओं ने शामिल होकर इसकी शोभा बढ़ाई। राजा की चानणी के पास देवलुओं ने कुल्लवी नाटी डाली। इससे पहले राजा की चानणी के पास सैंज में रैला के देवता लक्ष्मी नारायण, माता आशापुरी, देवता मनु ऋषि और भूपन के रिंगू नाग ने एक-दूसरे से भव्य देवमिलन किया। करीब सवा चार बजे राजा की चानणी से ढोल-नगाड़ों के साथ जलेब निकली। जलेब में सबसे आगे नरसिंह भगवान की घोड़ी चली। तलवार और ढाल को पकड़कर भगवान रघुनाथ के मुख्य छड़ीबरदार महेश्वर सिंह पालकी में सवार हुए।

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