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तमिलनाडु के चिदम्बरम मंदिर में किया था भगवान शिव ने संध्या तांडव

स्त्री-पुरुष के आपसी मनोभावों के आधार पर होने वाली लीला है लास्य

तमिलनाडु के चिदम्बरम मंदिर में किया था भगवान शिव ने संध्या तांडव

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संगीत-नाट्य के आदि प्रवर्तक हैं भगवान शिव। कहते हैं, कभी अपने नृत्य के बाद उन्होंने डमरू बजाया। डमरू की ध्वनि से ही शब्द ब्रह्म नाद हुआ। यही ध्वनि चौदह बार प्रतिध्वनित होकर व्याकरण शास्त्र के वाक् शक्ति के चौदह सूत्र हुए। नृत्य में ब्रह्मांड का छन्द, अभिव्यक्ति का स्फोट सभी कुछ इसी में छिपा है।

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सुर-ताल के महान ज्ञाता हैं भगवान शिव। नृत्य की चरम परिणति शिव का ताण्डव ही तो है। नटराज जब नृत्य करते हैं तो संपूर्ण ब्रह्माण्ड में सर्वेश्वर की लीला का उच्छास उनके अंग-प्रत्यंग में थिरक उठता है।

भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के अनुसार लास्य का अर्थ लीला या क्रीड़ा करना है। स्त्री-पुरुष के आपसी मनोभावों के आधार पर होने वाली लीला लास्य है। यह एक ही अर्थ या अलग-अलग अर्थों पर अवलम्बित हो सकती है। पारम्परिक मान्यता यह भी है कि नटराज शिव ने पहले पहल पृथ्वी पर तमिलनाडु के चिदम्बरम मंदिर में ही संध्या तांडव किया।
मन में कल्पना होती है, नटराज शिव मगन हो नृत्य कर रहे हैं। वह जब नृत्य करते हैं तो एकाकी कहां होते हैं! सृष्टि के विकास में सभी प्रादुर्भूत सहायक शक्तियां वहां एकत्र हैं। ब्रह्मा ताल देते हैं। सरस्वती वीणा बजाती है। इन्द्र बांसुरी बजाते हैं और विष्णु मृदंग। लक्ष्मी गान करती हैं। भेरी, परह, भाण्ड, डिंडिम, पणन, गोमुख आदि अनद्ध वाद्यों से गुंजरित है यह संपूर्ण ब्रह्माण्ड।
बहरहाल, नटराज प्रवर्तित नृत्य के अनेक प्रकार हैं। तांडव सर्वप्रमुख है। कहते हैं शिव ने त्रिपुरदाह के बाद उल्लास नर्तन किया। भगवान शिव उल्लास में आकर पृथ्वी पर अपना पैर पटके, भुजाओं को संकुचित करते हुए अभिनय करते हैं ताकि यह लोक उनकी भुजाओं के आघात से छिन्न-भिन्न न हो जाए। शिव तीसरा नेत्र खोलें तो यह लोक भस्म हो जाये सो वह तृतीय नेत्र बंद करके ही नृत्य करते हैं। भोले भंडारी नाचने लगे तो सब कुछ भूल गए। नाचते ही रहे… निर्बाध। कहते हैं, उन्हें संयत करने के लिए ही तब पार्वती ने लास्य नृत्य किया। शिव तांडव रस भाव से विवर्तित था और पार्वती का किया लास्य रस भाव से समन्वित।

कालिदास ने मालविकाग्निमित्र में शिव के नृत्य का वर्णन करते लिखा है, यह नाट्य देवताओं की आंखों को सुहाने वाला यज्ञ है। पार्वती के साथ विवाह के अनन्तर शिव ने अपने शरीर में इसके दो भाग कर दिए हैं। पहला तांडव है और दूसरा लास्य। तांडव शंकर का नृत्य है-उद्धत। लास्य पार्वती का नृत्य है – सुकुमार तथा मनोहर।
बहरहाल, नटराज की नृत्यशाला यह संपूर्ण ब्रह्माण्ड है। सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोभाव और अनुग्रह इन पांच ईश्वरीय क्रियाओं का द्योतक नटराज का नृत्य ही है। शिव के आनंद तांडव के साथ ही सृजन का आरंभ होता है और रोद्र तांडव के साथ ही संपूर्ण विश्व शिव में पुनः समाहित हो जाता है।

नटराज को भगवान शिव का प्रतीक माना जाता है। हिंदू धर्म में काल के देव माने जाने वाले भगवान शिव की नृत्य भंगिमा वाले रूप को ही नटराज कहा जाता है। यह नृत्य विनाश का प्रतीक भी है इसलिए इसे अपने घर पर रखने से बचना चाहिए। दक्षिण भारत के तमिलनाडु में बत्तीस एकड़ के क्षेत्र में दो नदियों के मध्यभाग में चिंदबरम् ऐसा शिव मंदिर है जहां शिवलिंग नहीं है, बल्कि कांसे की नटराज मूर्ति विराजित है। नटराज की शक्ति-स्वरूपा नाट्येश्वरी भी है। मंदिर की शिल्प कला बेजोड़ है। धरती पर इसी स्थान पर ही भगवान शिव ने तांडव किया था।

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