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इस लिए दर्ज करवाई जाती है जीरो एफआईआर, अधिकार क्षेत्र का भी नहीं रहता है लफड़ा

पुलिस को तुरंत लेना पड़ता है एक्शन, समय से कार्रवाई से बचाए जा सकते हैं सबूत

इस लिए दर्ज करवाई जाती है जीरो एफआईआर, अधिकार क्षेत्र का भी नहीं रहता है लफड़ा

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घटना होने पर पहले पुलिस स्टेशन मेें रिपोर्ट लिखवानी होती है। इसे एफआईआर कहा जाता है। यह एक लिखित दस्तावेज होता है और इसी के आधार पर पुलिस एक्शन लेती है। हालांकि कई मामलों में पुलिस खुद एक्शन (Action) लेती है तो कभी उन्हें किसी घटना के बारे में बताना पड़ता है। इसे एफआईआर यानी फर्स्ट इनफार्मेशन रिपोर्ट (first information report) कहा जाता है। कई बार देखा जाता है कि अधिकतर धानाध्यक्ष या चौकी अधिकारी रिपोर्ट लिखने से मना कर देते हैं। वह बोलता है कि यह क्राइम उनके क्षेत्र में नहीं हुआ है। इसी समस्या का हल करने के लिए जीरो एफआईआर का प्रावधान है। आइए आपको बताते हैं कि क्या होती है जीरो एफआईआर।

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अधिकार क्षेत्र की अड़चनें पैदा नहीं होतीं

जीरो एफआईआर भी सामान्य एफआईआर (FIR) की तरह ही होती है। मगर इसमें किसी भी किस्म के अधिकार क्षेत्र की अड़चन पैदा नहीं होती है। जीरो एफआईआर में पीड़ित व्यक्ति या उसका उसका रिश्तेदार अथवा चश्मदीद थाने में जाकर रिपोर्ट लिखवा सकता है। इसे ही जीरो एफआईआर कहा जाता है। जीरो एफआईआर के आधार पर पुलिस अपनी जांच शुरू कर देती है। बाद में वह केस संबंधित क्षेत्र के थाने में ट्रांसफर करवा दिया जाता है।

बढ़ गया है क्राइम रेट

आजकल क्राइम रेट बढ़ गया। इसे देखते हुए ही जीरो एफआईआर की जरूरत महसूस हुई। विशेषकर सन 2012 में दिल्ली में निर्भया के साथ हुए गैंगरेप ने सारे देश को डरा दिया। इसके बाद ही कानून में सुधार करने के लिए जस्टिस वर्मा की कमेटी गठित की गई थी। इस कमेटी ने महिलाओं के प्रति होने वाले जुर्मों को मिटाने के लिए कड़े कानून बनाए। इसके कुछ पुराने कानूनों में भी सुधार किया गया। इसी कमेटी ने जीरो एफआईआर का सुझाव दिया था। जीरो एफआईआर के बाद पुलिस ऑफिसर को अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर भी एक्‍शन लेने की छूट मिलती है।

जीरो एफआईआर के बहुत ज्यादा लाभ हैं। इससे बिना देरी किए ही पुलिस को घटना की जानकारी मिल जाती है। इसमें अधिकार क्षेत्र का लफड़ा भी नहीं रहता है। समय पर कार्रवाई हो जाती है जिस कारण कई साक्ष्य और सबूत मिटने से बच जाते हैं। वहीं न्याय की गुहार लगाने वाले को भी दर-दर भटकने की जरूरत नहीं होती। आमतौर पर अपराधा कॉग्नीजेबल और नॉन कॉग्निजेबल (cognizable and non cognizable) दो प्रकार के होते हैं। कॉग्निजेबल अपराध बहुत ही संगीन अपराध होते हैं। इसमें कत्ल, रेप, जानलेवा हमला आदि आते हैं। इनमें तुरंत एफआईआर लॉज होने की जरूरत होती है। कॉग्नीजेबल अपराधों में जीरो एफआईआर दर्ज करवाई जाती है। वहीं नॉन.कॉग्नीजेबल अपराधों गंभीर अपराधों की श्रेणी में नहीं आते, जैसे मारपीट या लड़ाई.झगड़ा आदि। इस तरह के मामलों में सीधे एफआईआर दर्ज नहीं की जाती है बल्कि इन्‍हें पहले मजिस्ट्रेट के पास रेफर कर दिया जाता है। जिसके बाद मजिस्ट्रेट समन जारी करता है और उसके बाद ही आगे की कार्रवाई शुरू होती है।

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