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नो केमिकल, सिर्फ ऑर्गेनिक… हिमाचल में यहां ऐसे बनती है शक्कर
हमीरपुर। जिला में पारंपरिक तरीके से बिना केमिकल के शक्कर (Sugar) तैयार की जा रही है। जिला के जोलसप्पड़ (Jolsappad) में एक परिवार दशकों से इस कार्य को कर रहा है। शक्कर तैयार करने की इस पारंपरिक तकनीक में हिमाचल (Himachal) में पाए जाने वाले भयूल नामक पेड़ की छाल का इस्तेमाल किया जाता है। हिमाचल में यह पेड़ अधिक पाया जाता है, लेकिन इसके इस इस्तेमाल को लेकर बहुत ही कम लोगों को जानकारी है। वर्तमान समय में फैक्ट्रियों (factories) में अधिक मात्रा में तैयार किए जाने वाले शक्कर को बेकिंग पाउडर (Baking Powder) अथवा कैमिकल कलर देकर उत्पादन किया जाता है। जोलसप्पड़ में यह परिवार पारंपरिक तरीके से शक्कर का उत्पादन कर रहा है। इतना ही नहीं, यह परिवार गन्ना भी अपनी ही जमीन में पैदा कर रहा है तथा ऑर्गेनिक तरीके यह पैदा किया जा रहा है। ऐसे में यहां पर तैयार की जा रही शक्कर को ऑर्गेनिक शक्कर कहना भी गलत नहीं होगा।
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शक्कर तैयार करने की इस प्रक्रिया में जलावन के लिए लकड़ी का इस्तेमाल करने के बजाय गन्ने के वेस्ट को ही इस्तेमाल किया जा रहा है। पहले यह परिवार कई सालों से गन्ने को पंजाब (Punjab) से खरीद कर शक्कर तैयार कर रहा था, लेकिन कोरोना काल के दौरान परिवार ने अपनी जमीन पर ही गन्ना पैदा करना शुरू किया है। डिमांड की अगर बात की जाए तो इस ऑर्गेनिक शक्कर की खूब डिमांड देखने को मिल रही है। 120 प्रति किलो के हिसाब से इस शक्कर को बेचा जा रहा है। सुनील कुमार ने बताया कि शक्कर बनाने का काम उनके दादा (Grandfather) व पिता लंबे समय से कर रहे थे। अब वह इस कार्य को कर रहे हैं। कोरोना (Corona) काल में उन्होंने गन्ना उगाना भी शुरू कर दिया था, जिसे उन्होंने अब जारी रखा है। उन्होने बताया कि क्षेत्र के शुगर के मरीज भी उनसे शक्कर खरीदते हैं। वहीं, लकड़ी का इस्तेमाल पहले जलावन के तौर पर किया जाता था, लेकिन अब गन्ने के वेस्ट को ही जलावन के लिए प्रयोग किया जा रहा है। वह साल में 3 महीने इस कार्य को करते हैं। लोगों की अच्छी डिमांड ऑर्गेनिक शक्कर के लिए उनके पास है, वह लोगों की डिमांड (Demand) को पूरा तक नहीं कर पा रहे हैं।
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