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सूनी गोद को प्रकृति की हरियाली से भरा: निःसंतान दंपती ने समाज और पर्यावरण के लिए पेश की मिसाल
Inspirational Story: संतान सुख ना मिलने का दुख और समाज के ताने अक्सर इंसान को भीतर तक निराश कर देते हैं। लेकिन, मध्य प्रदेश के रीवा जिले स्थित डभौरा क्षेत्र के धुरकुच गांव के एक दंपती ने इस पीड़ा को एक ऐसी ताकत में बदला, जो आज समाज और पर्यावरण दोनों के लिए एक बड़ी मिसाल बन गई है। दीनानाथ कोल और उनकी पत्नी ननकी देवी ने अपनी सूनी गोद को प्रकृति की हरियाली से भर लिया और पेड़ों को ही अपना परिवार मान लिया।
आम की गुठलियों से हुई थी शुरुआत
इस भगीरथ प्रयास की शुरुआत वर्ष 1990 में हुई थी। दीनानाथ कोल बताते हैं कि एक कार्यक्रम से लौटते समय उन्होंने रास्ते में फेंकी गई आम की गुठलियां एकत्र कीं और उन्हें बंजर भूमि पर बो दिया। शुरुआत में कई पौधे नष्ट हुए, लेकिन उनका हौसला नहीं टूटा। विवाह के कई वर्षों बाद भी जब इस दंपती के आंगन में किलकारी नहीं गूंजी, तो उन्हें लोगों के ताने सुनने पड़े। इसी बीच पत्नी ननकी देवी ने सुझाव दिया कि यदि बच्चे नहीं हैं, तो कुछ ऐसा किया जाए जिससे समाज में उनकी एक अलग पहचान बने। इसके बाद दोनों ने पौधारोपण का दृढ़ संकल्प लिया और अपना पूरा जीवन इसी मिशन को समर्पित कर दिया।
संघर्षों ने ली कड़ी परीक्षा
यह सफर बिल्कुल भी आसान नहीं था। जंगल को बचाने और पौधों को सींचने के लिए दंपती ने अपने प्रयासों से एक कुआं खुदवाया था। लेकिन, विडंबना देखिए कि उसे अतिक्रमण बताकर पाट दिया गया। पानी की कमी के कारण उनके कई पौधे सूख गए, फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी। आज भी नलकूप की स्वीकृति मिलने के बावजूद उसका खनन नहीं हो पाया है, लेकिन उनका पौधों के प्रति समर्पण जस का तस बना हुआ है।
अब वन्यजीवों का आशियाना बन चुका है ‘प्रेम वन’
कभी जो 105 एकड़ की जमीन वीरान, पथरीली और सूखी नजर आती थी, आज वहां हरियाली की मोटी चादर बिछी हुई है। आम, आंवला, अमरूद और बेर सहित अनेक फलदार व औषधीय वृक्षों से सजा यह जंगल क्षेत्र के पर्यावरण के लिए ‘जीवनदायिनी धरोहर’ बन चुका है। दंपती की मेहनत से तैयार हुए इस वन में आज मोर, हिरण, नीलगाय, खरगोश और अनेक पक्षियों का बसेरा है।
पेड़ों की सेवा और देखभाल में पूरा जीवन बीता
दीना नाथ बताते है -उनकी कोई संतान नहीं इसलिए उन्होंने पेड़ों को संतान माना और इन्ही की सेवा और देखभाल में पूरा जीवन बीत गया। दीनानाथ और ननकी देवी की यह कहानी यह संदेश देती है कि अगर इंसान के भीतर दृढ़ इच्छाशक्ति, समर्पण और नि:स्वार्थ सेवा का भाव हो, तो वह न केवल बंजर जमीन को हरा-भरा बना सकता है, बल्कि अपने जीवन को भी एक नई और महान सार्थकता दे सकता है।
पंकज शर्मा

