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सूरज ढलने के बाद शुरू हो जाती है इस पूर्व आईपीएस की ज्ञान और मस्ती की पाठशाला

झारखंड के 80 गांवों के बच्चों के दे रहा ज्ञान का प्रकाश

सूरज ढलने के बाद शुरू हो जाती है इस पूर्व आईपीएस की ज्ञान और मस्ती की पाठशाला

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झारखंड के तीन जिलों के 80 गांवों के बच्चों की हर शाम कुछ खास तरीके से गुजरती है। जब सूरज ढलने को होता है, तो गांव की किसी सार्वजनिक जगह पर जूट की दरियां बिछ जाती हैं, एक-दो इमरजेंसी लाइटें जल उठती हैं और उसकी रोशनी में सज जाती है बच्चों की पाठशाला। ऐसी पाठशाला, जहां पढ़ाई का मतलब सिर्फ क्लास वर्क-होमवर्क का बंधा-बंधाया ढर्रा नहीं। हर शाम दो से ढाई घंटे तक चलने वाली ज्ञान और मस्ती की ऐसी पाठशाला, जहां किसी विषय पर धाराप्रवाह बोलने के तौर-तरीकों से लेकर, वाद-विवाद, नृत्य-संगीत, खेल-कूद और कंप्यूटर-इंटरनेट तक की ट्रेनिंग दी जाती है। पाठशाला में छात्र-छात्राओं के लिए ना कोई फीस है और ना ही यहां पढ़ाने वालों की कोई तनख्वाह। स्वयं सहायता के फॉमूर्ले पर रात्रि पाठशालाओं का यह रचनात्मक आंदोलन पिछले पांच-छह वर्षों में खड़ा हुआ है और इसके सूत्रधार हैं पंजाब पुलिस में आईजी रहे डॉ अरुण उरांव। आज की तारीख में राज्य के तीन जिलों रांची, लोहरदगा और गुमला में ऐसी 80 पाठशालाएं खड़ी हो गयी हैं।

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2014 में वीआरएस लेकर वह झारखंड आए डॉ अरुण उरांव

डॉ अरुण उरांव 1992 बैच के आईपीएस थे। उन्हें लगा कि नौकरी से भी कुछ बड़ा करना है तो अपने घर- अपने राज्य चलना चाहिए और 2014 में वीआरएस लेकर वह झारखंड आ गये। तब से डॉ उरांव का एक पांव राजनीति में है तो दूसरा पांव गांव-गिरांव से लेकर खेल के मैदान में। डॉ अरुण उरांव आईएएनएस से कहते हैं कि जब मैंने आइपीएस की नौकरी से वालेंटरी रिटायरमेंट लिया, तो अपने घर पर कुछ बच्चों को पढ़ाने लगा। तभी महसूस हुआ कि गांव के बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले, इसके लिए कुछ किया जाना चाहिए और इसके बाद बाबा कार्तिक उरांव रात्रि पाठशाला के संचालन की योजना बनी और फिर रांची के मांडरप्रखंड अंतर्गत उचरी गांव से इसकी शुरूआत हो गयी। कार्तिक उरांव उनके ससुर थे, जो अपने दौर में झारखंड के दिग्गज राजनेता-सांसद थे। उनके नाम पर चलायी जा रही रात्रि पाठशालाओं के लिए अब तक कोई सरकारी या कॉरपोरेटफंडिंग नहीं ली गयी है। स्वयं सहायता का फॉमूर्ला ही अब तक इन पाठशालाओं के संचालन का आधार रहा है। व्यक्तिगत तौर पर समाज के सक्षम लोग या जनप्रतिनिधि भी स्वैच्छिक तौर पर कुछ मदद जरूर करते हैं। इन पाठशालाओं की मॉनटरिंग अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद के जरिए की जाती है।


पहले दिन तीन बच्चों से हुई शुरूआत

उचरी गांव में 2014 में खुली पहली पाठशाला के संचालन की जिम्मेदारी अनिल उरांव नामक युवक ने संभाली थी। अनिल बताते हैं कि पहले दिन तीन बच्चों से शुरूआत हुई। हफ्ते-दस दिन में ही 40 बच्चे जुट गये और अब इस गांव की पाठशाला में तकरीबन 200 छात्र-छात्राएं रोज आते हैं। जिस भी गांव में पाठशाला खुलती है, वहां कॉलेज जान ेवाले या कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर चुके युवा खुद शिक्षक के तौर पर श्रमदान का संकल्प लेते हैं। परिषद की ओर से सिर्फ कुछ दरियों, ब्लैकबोर्ड और एक-दो इमरजेंसी लाइट की व्यवस्था की जाती है। हर तीन महीने पर आदिवासी परिषद रात्रि पाठशालाओं की व्यवस्था और उनके संचालन की समीक्षा करती है। हर पाठशाला में 150-200 तक बच्चे हैं और 5 से 10 शिक्षक। 80वीं पाठशाला बीते आठ जनवरी को रांची के कांकेप्रखंड अंतर्गत कुम्हरिया गांव में खोली गयी, जहां गांव के दो युवकों पंकज एवं संदीप ने शिक्षक के रूप में सेवा देने का संकल्प लिया। कुल 80 पाठशालाओं में 300 से भी ज्यादा शिक्षक करीब 4000 बच्चों को पढ़ा रहे हैं।


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अखड़ा और धुमकुड़िया में चलती हैं पाठशालाएं

झारखंड के जनजातीय बहुल गांवों में अखड़ा और धुमकुड़िया की परंपरा सैकड़ो साल से ही है। यह गांव के वो सार्वजनिक स्थल होते हैं, जहां स्त्री-पुरुष जीवन के व्यावहारिक पहलुओं और समाज की सांस्कृतिक-सामाजिक परंपराओं से जुड़ने के लिए इकट्ठा होते हैं। ज्यादातर रात्रि पाठशालाएं या तो अखड़ा और धुमकुड़िया में चलती हैं या फिर किसी सामुदायिक भवन या किसी के दालान में। रात्रि पाठशालाओं के शिक्षकों के लिए परिषद की ओर से समय-समय पर कार्यशालाएं भी आयोजित की जाती हैं, जहां उन्हें पठन-पाठन को आसान एवं रुचिकर बनाने के गुर सिखाए जाते हैं। चार पाठशालाओं को कंप्यूटर मुहैया कराये गये हैं, जहां प्रोजेक्टर के माध्यम से डिजिटलक्लासेज की शुरूआत की गई है। गणित, अंग्रेजी और विज्ञान विषयों में बच्चों को बेहतर बनाने का प्रयास होता है। पहली से लेकर दसवीं तक के बच्चों के लिए विषयवार, कक्षावार क्लास लगती है। कई पाठशालाओं में पुस्तकालय भी खोले गये हैं।


गुरुवार की क्लास सांस्कृतिक गतिविधियों पर केंद्रित

इन पाठशालाओं में हर गुरुवार की क्लास सांस्कृतिक गतिविधियों पर केंद्रित होती है। स्थानीय भाषा की क्लास के बाद अखड़ा में बच्चों को पारंपरिक गीत एवं नृत्य सिखाने की जिम्मेवारी गांव के बुजुर्गों की होती है। ‘योग’ एवं शारीरिक कसरत को भी पाठ्यक्रम का अभिन्न हिस्सा बनाया गया है। रविवार या छुट्टी के दिन बच्चों को फुटबॉल की ट्रेनिंग दी जाती है। पाठशाला के बच्चों के लिए समय-समय पर बौद्धिक एवं सांस्कृतिक प्रतियोगिताएं आयोजित होती हैं और बेहतर करने वालों को पुरस्कृत किया जाता है। लड़के-लड़कियों में अंतर पाठशाला फुटबॉल प्रतियोगिता का क्रेज सबसे ज्यादा है। डॉ अरुण उरांव बताते हैं कि अब हमारा फोकस गांव के युवाओं को विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तैयार करने पर है। फौज, केंद्रीय सुरक्षा बल एवं पुलिस की भर्ती में शामिल होने के इच्छुक युवाओं को गांव के ही सेवानिवृत्त फौजी एवं पुलिस अधिकारियों की देखरेख में शारीरिक- मानसिक परीक्षण के लिए तैयार किया जा रहा है। कुछ गांवों में महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़ने के लिए सिलाई केंद्र की शुरूआत भी की गयी है। सबसे गौरतलब बात यह कि बीते दो वर्षों में जहां स्कूल और कॉलेजकोरोना के चलते बंद रहे, वहीं रात्रि पाठशालाएं कोविड प्रोटोकॉल को फॉलो करते हुए नियमित रूप से चलती रहीं।

-आईएएनएस

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