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भगवान शिव और उनकी वेशभूषा से जुड़े प्रतीक चिन्ह

भगवान शिव और उनकी वेशभूषा से जुड़े प्रतीक चिन्ह

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हिंदू धर्म में सबसे पूज्य देवी देवताओं में से एक हैं भगवान शिव। देवों के देव महादेव लोगों के दुखों के संहारकर्ता भगवान शिव की पूजा मूर्ति एवं शिवलिंग दोनों ही रूपों में की जाती है। इस सृष्टि के स्वामी शिव को भक्त महादेव, भोलेनाथ, शिव शंभू जैसे कई नामों से पुकारते हैं। भगवान शिव को रूद्र नाम से जाना जाता है रुद्र का अर्थ है रुत दूर करने वाला अर्थात दुखों को हरने वाला।

शिव में परस्पर विरोधी भावों का सामंजस्य देखने को मिलता है। शिव के मस्तक पर एक ओर चंद्र है, तो दूसरी ओर महाविषधर सर्प भी उनके गले का हार है।वे अर्धनारीश्वर होते हुए भी कामजित हैं। गृहस्थ होते हुए भी श्मशानवासी, वीतरागी हैं। सौम्य, आशुतोष होते हुए भी भयंकर रुद्र हैं। शिव परिवार भी इससे अछूता नहीं हैं। उनके परिवार में भूत-प्रेत, नंदी, सिंह, सर्प, मयूर व मूषक सभी का समभाव देखने को मिलता है। वे स्वयं द्वंद्वों से रहित सह-अस्तित्व के महान विचार का परिचायक हैं। शिव का संपूर्ण रूप देखकर यह संदेश मिलता है कि हम जिन चीजों को अपने आस-पास देख भी नहीं सकते उसे उन्‍होंने बड़ी आसानी से अपनाया है।

भगवान शिव सौम्य आकृति एवं रौद्ररूप दोनों के लिए विख्यात हैं। अन्य देवों से शिव को भिन्न माना गया है। सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति एवं संहार के अधिपति शिव हैं। त्रिदेवों में भगवान शिव संहार के देवता माने गए हैं। शिव अनादि तथा सृष्टि प्रक्रिया के आदिस्रोत हैं और यह काल महाकाल ही ज्योतिषशास्त्र के आधार हैं। शिव का अर्थ यद्यपि कल्याणकारी माना गया है, लेकिन वे हमेशा लय एवं प्रलय दोनों को अपने अधीन किए हुए हैं। रावण, शनि, कश्यप ऋषि आदि इनके भक्त हुए है। शिव सभी को समान दृष्टि से देखते है इसलिये उन्हें महादेव कहा जाता है। भगवान शिव से जुड़े बहुत सारे ग्रंथ लिखे गए हैं जिनमें उनके जीवन चरित्र, रहन-सहन, विवाह और उनके परिवार के बारे में बताया गया है। लेकिन उन सब में से महर्षि वेदव्यास द्वारा लिखे गए शिव-पुराण को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। इस ग्रंथ में भगवान शिव की भक्ति महिमा और उनके अवतारों के बारे में विस्तार से बताया गया है। माना जाता है कि शिवपुराण को पढ़ने और सुनने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शिव पुराण में प्रमुख रूप से शिव-भक्ति और शिव-महिमा का प्रचार-प्रसार किया गया है।

 

भगवान शंकर का चित्र या मूर्ति पर जटाएं हैं। उन जटाओं में एक चन्द्र चिह्न होता है। उनके मस्तक पर तीसरी आंख है। वे गले में सर्प और रुद्राक्ष की माला लपेटे रहते हैं। उनके एक हाथ में डमरू तो दूसरे में त्रिशूल है। वे संपूर्ण देह पर भस्म लगाए रहते हैं। उनके शरीर के निचले हिस्से को वे व्याघ्र चर्म से लपेटे रहते हैं। वे वृषभ की सवारी करते हैं और कैलाश पर्वत पर ध्यान लगाए बैठे रहते हैं। शिव के ये सभी प्रतीक अपने आप में कई रहस्यों को समेटे हुए हैं जिन्हें सभी भक्तजनों को जानना चाहिए। शिव के स्वरूप का विशिष्ट प्रभाव अपनी अलग-अलग प्रकृति को दर्शाता है। पौराणिक मान्यता से देखें तो हर आभूषण का विशेष प्रभाव तथा महत्व बताया गया है। शिव की वेशभूषा ऐसी है कि प्रत्येक धर्म के लोग उनमें अपने प्रतीक ढूंढ सकते हैं। भगवान शिव सब देवों से निराले हैं।

उनका वेश, स्वरूप, श्रृंगार और प्रतीक – ये सब उन्हें विशेष बनाते हैं। वे संपूर्ण जगत के निर्माता हैं। समाधि में रहकर भी पूरे विश्व पर उनकी नजर रहती है।उनकी समाधि जितनी रहस्यमय है, उतने ही रहस्यमय हैं उनके साथ जुड़े प्रतीक। शिव अपने शरीर पर भस्म धारण करते हैं। भस्म जगत की निस्सारता का बोध कराती है। भस्म आकर्षण, मोह आदि से मुक्ति का प्रतीक भी है। देश में एकमात्र जगह उज्जैन के महाकाल मंदिर में शिव की भस्म आरती होती है जिसमें श्मशान की भस्म का इस्तेमाल किया जाता है। यज्ञ की भस्म में वैसे कई आयुर्वेदिक गुण होते हैं। प्रलयकाल में समस्त जगत का विनाश हो जाता है, तब केवल भस्म (राख) ही शेष रहती है। यही दशा शरीर की भी होती है।

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