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नई शिक्षा नीति इतिहास, परंपरा व मिट्टी से जुड़े विचारों को आगे लाने में सहायक होगी

केंद्रीय विश्वविद्यालय में 'शिक्षा का भारतीय स्वरूप' संगोष्ठी में बोले राज्यपाल

नई शिक्षा नीति इतिहास, परंपरा व मिट्टी से जुड़े विचारों को आगे लाने में सहायक होगी

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धर्मशाला। राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर ने कहा कि वर्षों बाद देश में राष्ट्रीय शिक्षा नीति आई है। यह नीति देश के इतिहास, परंपरा और देश की मिट्टी से जुड़े विचारों को आगे लाने में सहायक होगी। राज्यपाल आज केंद्रीय विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित संगोष्ठी- ‘शिक्षा का भारतीय स्वरूप’ विषय पर आयोजित एक दिवसीय संगोष्ठी में बतौर मुख्यातिथि शिरकत करने उपरांत पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे। राज्यपाल ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति से देश को पूरी दुनिया में आगे लाने का मौका मिलने वाला है। इस शिक्षा नीति को सबको अपनाना चाहिए और आगे बढऩे का प्रयास करना चाहिए। केंद्रीय विश्वविद्यालय हिमाचल प्रदेश द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति को अपनाने पर बधाई देते हुए राज्यपाल ने कहा कि आज की संगोष्ठी में शामिल हुए लोगों में भी वक्ताओं के विचार सुनने उपरांत नया विचार प्रवाह शुरू होने लगेगा। शिक्षा नीति आवश्यक है, जिसे अन्य विश्वविद्यालयों को भी अपनाना चाहिए और केंद्रीय विश्वविद्यालय हिमाचल प्रदेश का अनुसरण करना चाहिए।

हमारी सोच में देश प्रेम प्रथम होना चाहिये

भारत तिब्बत सहयोग मंच के राष्ट्रीय संयोजक एवम राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक इंद्रेश कुमार ने कहा कि दुनिया ने मॉडल ऑफ कलेक्टिविटी दी जबकि हमारी संस्कृति ने इंटेग्रिटी का मॉडल दिया। उन्होंने कहा कि हमारी सोच में देश प्रेम प्रथम होना चाहिये। उन्होंने कहा कि देश की आजादी के लिये जितने भी संघर्ष हुए वह एक ही नारे पर लड़े गए कि “अंग्रेजों भारत छोड़ो’, वह रोटी, कपड़ा, मकान के नारों पर केंद्रित नहीं था। हमारे लिये विश्व गुरु भगवान राम का सम्बोधन है, जबकि महाशक्ति रावण का उदबोधन। उन्होंने कहा कि जीवनमूल्य का पूजन होता है, उसे ही सलाम किया जाता है। उन्होंने कहा कि दुनिया में संस्कृति, सभ्यता और मूल्य के लिये एक राष्ट्र को चिन्हित करने की बात हो तो हमेशा “भारत, भारतीय, भारतीयता“ ही लिखा जाएगा। यह शब्द ही बहू-परम्परा, बहू-संस्कृति, बहुभाषी है। उन्होंने कहा कि ज्ञान और विज्ञान को हमने चरित्र से लिया है। भारत सर्व समावेशी देश है। इसलिये, मज़हबी संघर्ष को हमारी संस्कृति, ज्ञान, विज्ञान ही दूर कर सकता है।

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