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दोनों पार्टियों के चुनावी मेनिफेस्टो: पास नहीं दाने और अम्मा चली भुनाने

बीजेपी और कांग्रेस के बड़े-बड़े दावों पर जनता पूछ रही है सवाल

दोनों पार्टियों के चुनावी मेनिफेस्टो: पास नहीं दाने और अम्मा चली भुनाने

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कांगड़ा। एक कहावत  बहुत मशहूर है कि पास नहीं दाने और अम्मा चली भुनाने। जी हां यह कहावत हिमाचल में चरितार्थ होती जा रही है। चुनावी बयार है तो वादे भी आसमान पर हैं। दोनों पार्टियों ने चुनावी मेनिफेस्टो (Election Manifesto) रिलीज कर दिए हैं। इनमें वादों की बरसात है। वोटरों को रिझाने की पूरी कवायद है। सपने हसीन दिखाए जा रहे हैं। पार्टियों का मकसद  इस वक्त वक्त वोट बैंक बनाना है, फिर चाहे वादों की सीमाएं जहां तक चली जाएं। एक और कहावत है कि चादर देखकर पैर पसारे जाएं। मगर इस वक्त सिर्फ पैर पसारने की होड़ है। चादर की तरफ कौन देखता है। वो तो जब ठंड लगेगी तब पता चलेगा चादर वाकई छोटी है और पूरी नहीं हो पा रही है। यह बात हिमाचल में होती दिख रही है। हिमाचल पर 80 हजार करोड़ का कर्ज पहले से है।

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आलम यह है कि कर्ज चुकाने के लिए ऊपर से कर्ज लेना पड़ रहा है। ऐसे में राजनीतिक धुरंधरों के वादों की बरसात पूरे स्विंग पर है । सवाल यह है कि इन वादाओं की बिसात क्या है। कितने वादे पूरा कर पाएगी सत्ता में आने वाली पार्टी फिलहाल यह तो वक्त ही बताएगा मगर रेस अपने यौवन पर है। सवाल यह भी उठता है कि बीजेपी ने चुनावी मेनिफेस्टो जारी किया है, तो बीजेपी क्या जानती नहीं है कि अंदर के हालात क्या हैं। पूरे पांच वर्ष तक उन्होंने हिमाचल की गद्दी पर राज किया है। सुविधाएं और रोजगार कितना दिया जनता जानती है मगर कर्जा 80 हजार करोड़ हजार रुपए तक पहुंच गया। बीजेपी (BJP) ने अपने चुनावी प्रचार के लिए भी कोई कम खर्च नहीं किया है।

स्टार प्रचारकों के आने-जाने और बड़ी-बड़ी रैलियां का खर्च कैसे हो रहा है एडजस्ट

बड़ी-बड़ी रैलियां क्या बिन पैसे से हो गई। हर चौथे दिन स्टार प्रचारकों का आना क्या सस्ता पड़ रहा है। कदापित नहीं। ऐसे में खजाना तो खाली होगा ही। यदि खजाना खाली है तो ऊंचे सपने भी क्यों दिखाए जा रहे हैं। मकसद सिर्फ चुनाव जीत कर सत्ता तक ही पहुंचना है कि जनता की सेवा करना। बात अगर कर्मचारियों की ही करें तो इस वक्त हिमाचल में लगभग 8000 करोड़ रुपए का जनवरी 2016 से नए वेतनमान का एरियर ही बकाया है। इसे ना तो पूर्व कांग्रेस सरकार और ना ही मौजूदा बीजेपी सरकार चुका पाई। हां एक किश्त जरूर दी गई है। वह भी तीस हजार से पचास हजार रुपए तक ही मिल पाई है। कई कर्मचारियों का पांच से सात लाख तक का एरियर अभी शेष है।

 इसके अतिरिक्त बागवानों ने बैंकों से कर्ज लेकर एंटी हेल नेट, सिंचाई टैंक, ग्रेडिंग पैकिंग हाउस, ग्रेडिंग पैकिंग मशीनें, सोलर फेंसिंग लगा रखी हैं, उनकी सब्सिडी कई क्षेत्रों में तो 4 से 5 साल बाद भी नहीं दी जा रही है। आलम यह है कि हिमाचल में हजारों करोड़ों का कर्ज चढ़ा हुआ है। कुछ ही दिन बाद हिमाचल (Himachal) के खाते में 2000 करोड़ का नया कर्ज भी आने वाला है। पुराने कर्ज को लौटाने के लिए नया कर्ज लेना पड़ रहा है। इसके लिए कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही जिम्मेदार हैं। 2019 में एक बार ऐसा ऐसा वक्त आ गया थाए जब प्रदेश की कर्ज लेने की सीमा पूरी हो चुकी थी। तब केंद्र सरकार ने कोरोना का हवाला देते हुए ळक्च् की तुलना में कर्ज लेने की सीमा 3 फीसदी बढ़ाकर 5 फीसदी की। इससे ही अभी विकास का पहिया चल रहा हैए मगर चुनाव जीतने के लिए जिस तरह की घोषणाएं की जा रही हैंए उन पर करोड़ों की लागत प्रदेश को ओर कंगाली की ओर धकेल रही है। अब सवाल उठता है कि प्रदेश की अंदरूनी हालत से यदि दोनों पार्टियां भलीभांति वाकिफ हैं तो इतने ऊंचे चुनावी वादे आखिर क्यों। आज का वोटर समझदार वोटर है। वह अपने आजू-बाजू सब ओर का ख्याल रखता है, तो वह इस बात को भी भलीभांति जानता है कि ये मेनिफेस्टो जारी कर महज वोट लेने की खातिर जनता को बेवकूफ ही बनाया जा रहा है। धरातल पर ऐसा कुछ भी नहीं होगा।

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