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लोहड़ी से चंबा में शुरू हुई 1000 साल पुरानी भूतों को भगाने की अनोखी परंपरा
सुभाष महाजन/चंबा। हर साल की तरह इस साल भी चंबा में मकर संक्रांति (Makar Sankranti) से एक दिन पहले भूत-प्रेतों को भगाकर (Ghost Buster) जिले में सुख-शांति लाने की कामना के साथ लोहड़ी (Lohri) मनाई गई। चंबा की एक हजार साल पुरानी इस परंपरा के तहत शहर के हर कोने में स्थापित 14 मढ़ियों को लोग एक महीने तक जलाएंगे। यह अनोखी परंपरा (Unique Tradition) एक हजार साल पहले राजा साहिल वर्मन ने दसवी शताब्दी में शुरू की थी।
यह है परंपरा का इतिहास
राजा साहिल वर्मन ने भरमौर से आकर चंबा रियासत को बसाया था। उन्होंने यहां पहुंचकर देखा तो इस स्थान में भूत प्रेतों का अधिकतर बसेरा हुआ करता था। उन्होंने भूत प्रेतों से निजात पाने के लिए शहर के हर कोने कोने में 7 मेल और 7 फीमेल 14 मढ़ियों (Madhis) की स्थापना कर दी। लोहड़ी के दिन से लगातार एक महीना लोग रात के समय इन मढ़ियों को जलाते थे। इनकी देखरेख मोहल्ले के सभी बूढे और बच्चे किया करते थे। ऐसा करने से भूत प्रेतों के आतंक तो समाप्त हुआ वहीं साथ में शांति (Brought Peace) भी कायम हो गई।
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परंपरा शुरू होती है शिव मंदिर से
इस परंपरा की शुरुआत सबसे पहले राजस्वी मुहल्ला सुराड़ा के भगवान शिव के मन्दिर से की जाती है। इस मंदिर से एक लकड़ी का त्रिशूल, जिसे मशाल यानी मुशाहरा कहा जाता है, बनाया जाता है। उसकी विधिवत तरीके से पूजा कर बैंड-बाजे के साथ मढ़ियों में डूबने की तैयारी की जाती है।
मशाहरा का होता है मिलन
चौन्तड़ा मुहल्ला में भी इसी तरह का एक और मशाल (Torch) यानी की मशाहरा तैयार किया जाता है। यह बजीर मशाहरा के नाम से जाना जाता है। रात ठीक ग्यारह बजे राज मुशारे की कई लोग अपने कंधे पर उठा आगे के लिए चल पड़ते हैं। दूसरी तरफ से बजीर मढ़ी से भी मुसहरा चल पड़ता है और एक जगह पर इन दोनों का मिलन करवाया जाता है जहां पर लोग खूब शोर-शराबा मचाते हैं। बाद में बजीर वापिस अपनी मढ़ी में चला जाता है।
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