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मनप्रीत कौर ने मल्टीनेशनल कंपनी की नौकरी छोड़ दिव्यांगों को लगाया गले

कई मूक-बधिरों को शिक्षित कर और ट्रेनिंग देकर बना चुकी है आत्मनिर्भर

मनप्रीत कौर ने मल्टीनेशनल कंपनी की नौकरी छोड़ दिव्यांगों को लगाया गले

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अगर कुछ करने का जज्बा हो तो रास्ते की मुश्किलें गायब हो जाती हैं। दशरथ मांझी की तरह चट्टान को काटकर सड़क बनाने का हौसला आ जाता है। इसी बात को सिद्ध किया है पुरवा की रहने वाली मनप्रीत कौर (Manpreet Kour) ने। उसने एक मल्टीनेशनल कंपनी (Multi National Company) में नौकरी को छोड़कर दिव्यांग बच्चों (Handicapped Children) को नया जीवन देने और उनके साथ खड़ा होने का फैसला लिया। उनको पांव पर खड़ा होने के लिए हुनर सिखाने का निर्णय लिया। यहां तक कि ऐसा करने पर उनके दोस्तों और रिश्तेदारों ने उसे पागल तक करार दे दिया मगर उसने अपना हौसला नहीं छोड़ा। मनप्रीत कौर का जन्म कानपुर में हुआ था। उसकी माता इंटर कॉलेज में लेक्चरर थी और पिता व्यवसायी थे। उसमें करुणा का भाव बचपन से ही था। वह बचपन से ही अपना टिफिन किसी जरूरतमंद बच्चे (Needy Children) को दे दिया करती थी। जब टीचर उसकी माता से यह शिकायत करती कि उसने खाना स्वयं ना खाकर किसी दूसरे बच्चे को दे दिया तो उसकी मां (Mother) उसे अपने सीने से लगा लेती थी कि उसकी बेटी एक नेक काम कर रही है।

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सेवाभाव की इतनी लगन हो गई कि मनप्रीत कौर ने शादी से पहले ही इंग्लिश लिटरेचर (English Literature) में मास्टर कंप्लीट कर लिया। जब वह दिव्यांगों के संपर्क में गई तो उसे लगने लगा कि जीवन में अभी तो बहुत करना बाकी है। मैंने जिन बच्चों पर काम करना है और उन बच्चों के बारे में कोई जानकारी नहीं तो यह बात अन्याय से कम नहीं होगीफ। उसके बाद उसने स्पेशल एजुकेशन में बीएड, पीजीपीडी (BEd, PGPD) और हाल ही में स्पेशल एजुकेशन में एमएड भी कर लिया। अभी वह पीएचडी की तैयारी कर रही है।इसके बाद सन 2022 में मनप्रीत कौर की शादी हो गई। पति ने भी हर कदम पर उसका साथ दिया। उसने अपने पति ही की कंपनी में साक्षात्कार (Interview) भी दिया और वह सिलेक्ट भी हो गई। वे दोनों साथ-साथ काम भी करने लगे। नोएडा की मल्टीनेशनल कंपनी में इन दोनों ने सात वर्ष तक एक साथ काम किया। इसमें पैकेज भी अच्छा था और इंसेंटिव (Incentive) भी सैलरी से ज्यादा थे। वहीं उसने अच्छा काम किया तो प्रोमोशन भी लगातार ही होती गई। कंपनी ने उसे यूएसए जाने का ऑफर भी दिया। मगर ठीक दूसरी तरफ भाग्य कुछ और ही खेल रचा रहा था। इसी मोड पर उसके नए सफर की कहानी आरंभ हुई।

Manpreet-kour

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हुआ यूं कि ऑफिस के बाहर बहुत सारे खाने-पीने के स्टॉल (Food Stalls) लगते थे। मगर उन्हें पुलिस परेशान करती थी। पुलिस (Police) उनको रेहड़ी हटाने के लिए कहती थी। वहीं वहां एक फुटपाथ वाला कुछ गरीब और दिव्यांग बच्चों को अपने के पीछे ग्रीन बेल्ट के पास बैठाकर इसलिए पढ़ाने लगा कि पुलिस वाला उसका ठेला ना हटाने पाए। उधर बहुत से लोग जाने लगे और बच्चों का चाय पिलाते और खाना भी देते। वहीं मनप्रीत कौर ने भी एक वाइट बोर्ड पर उन बच्चों को पढ़ाने की कोशिश की। ऐसा करते हुए बहुत अच्छा महसूस होने लगा। वह अब वहां रोज जाने लगी। तब उसने उन बच्चों को बारीकी से जाना। उन बच्चों में कुछ बोल नहीं सकते थे तो कुछ सुन नहीं सकते थे। मगर ये बच्चे शारीरिक और मानसिक स्तर पर बिलकुल स्वस्थ थे। यदि उनको सही मार्गदर्शन दिया जाए तो वे बहुत कुछ कर सकते हैं। उसने इन बच्चों के बारे में नेट में पढ़ना शुरू कर दिया।

Manpreet-kour

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मगर नौकरी करते हुए ऐसा करना पाना आसान नहीं था। इन बच्चों से ऐसी लगन लगी कि मनप्रीत नौकरी छोड़कर वापस कानपुर (Kanpur) आ गई और गली-गली में इन बच्चों पर रिसर्च शुरू कर दी। इसके साथ ही अपने घर के ही दो कमरों से दिव्यांग डेवलपमेंट सोसाइटी नाम की संस्था बनाकर इन बच्चों पर काम करना शुरू किया। ऐसा करने में उसे बहुत सी बाधाएं आईं। मगर घर-परिवार और पति ने उसका साथ दिया और सारी समस्याएं दूर होती गईं। एक वक्त तो लोगों ने उसे पागल कहना भी शुरू कर दिया। मगर इस बात से वह कभी परेशान नहीं हुई। काम शुरू करने के लिए बहुत सी जगहों पर भटकना पड़ा। जब कुछ नहीं मिला तो अपने ही घर के एक कमरे में मूक-बधिर बच्चों को पढ़ान शुरू कर दिया और आज वह 100 से ज्यादा बच्चों (More than 100 kids) को अपने पैरों पर खड़ा कर चुकी है। उसने पाया कि ये बच्चे बहुत कुछ कर सकते हैं। वे सिलाईए पेंटिंगए डांस, खेलकूद, हाथ से बना सामान आदि बना सकते हैं। जब उसके जीवन का मुश्किल दौर था तब उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ उसे रानी लक्ष्मीबाई वीरता पुरस्कार से नवाजा जो बच्चा बोल नहीं सकता, सुन नहीं सकता, उसके ड्राइविंग लाइसेंस (Driving License) हमारी संस्था दिव्यांग डेवलपमेंट सोसाइटी ने बनवाए। ऐसा उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) में पहली बार हुआ। फिर मुझे कानपुर और लखनऊ में कई सरकारी संस्थाओं में मेंबर बनाया गया। पूर्व राज्यपाल राम नाईक ने मेरा इस्तकबाल किया। इससे मेरे हौसले को ताकत मिली, लेकिन इस नेक काम में मेरा हाथ बंटाने वाले आज भी न के बराबर हैं।

आलम यह है कि मनप्रीत कौर अब तक दर्जनों युवाओं को अपने पैरों पर खड़ा कर चुकी है। उन्हें रोजगार दिलवा चुकी है। वहीं इसी दौरान उसने फेसबुक में सिंगापुर के संगठन के बारे में भी पढ़ा। उसने इन बच्चों को मुफ्त पढ़ाने का आमंत्रण दिया। इन बच्चों को सिंगापुर ले जाने तक बड़ी कठिनाई का सामना आ रहा था। जब उसे कहीं से मदद नहीं मिल पाई तो उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ ने बच्चों को सिंगापुर भेजने का फैसला लिया। महज दो ही दिन में वीजा और पासपोर्ट बना दिया गया। अतः उसके साथ केवल 20 बच्चे डिजिटल ट्रेनिंग के लिए वहां गए। सिंगापुर में इन बच्चों ने अपने हुनर से सभी को चकित कर दिया। ट्रेनिंग के बाद अब टेक्नोलॉजी एक्सपर्ट के रूप में ये बच्चे काम कर रहे हैं। वहीं उत्तर प्रदेश की राज्यपाल ने मनप्रीत कौर को कानपुर और लखनऊ में कई सरकारी संस्थाओं में मेंबर बनाया। दिव्यांग डेवलपमेंट सोसाइटी के जरिए दिव्यांग स्पोर्ट्स एकेडमी की शुरुआत होने जा रही है, जिसमें दिव्यांग बच्चों के लिए क्रिकेट, बैडमिंटन, स्केट्स, वॉलीबॉल जैसे खेल शुरू किए जाएंगे। दिव्यांग बच्चों के लिए कानपुर में निशुल्क हॉस्टल की शुरुआत होने जा रही है।

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