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जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया से विलुप्त हो जाएंगे 65 प्रतिशत कीड़े

ताजा अध्ययन में सारा सच आया सामने, वातावरण पर पड़ेगा गहरा असर

जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया से विलुप्त हो जाएंगे 65 प्रतिशत कीड़े

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जलवायु परिवर्तन (Climate change) ना केवल मनुष्य पर ही प्रभाव डाल रहा है बल्कि यह कई कीड़ों-मकौड़ों (Insects) पर भी परिवार डाल रहा है। आपको पता होगा कि कुछ मित्र कीड़े होते हैं जो मनुष्य की मदद करते हैं। जैसे कि फसलों के लिए भी मित्र कीड़े होते हैं। इन कीड़ों की वजह से फसल की पैदावार (Crop yields) बढ़ती है और ये रक्षा भी करते हैं। वहीं दहीं को भी मित्र कीड़े ही बनाते हैं। वैसे तो हर जीव की तरह कीड़ों की भी पृथ्वी के पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) में अपनी एक भूमिका हैए लेकिन कीड़ेए फलए सब्जियांए फूलए आदि के उत्पादन में एक बहुत ही अहम भूमिका निभाते हैं क्योंकि वे परागण के रूप में योगदान देते हैं और साथ जैविक पदर्थ के विखंडन की प्रक्रिया में भी भूमिका निभाते हैं।

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कीड़े हानिकारक कीटों को नियंत्रित करने में मददगार होते हैं। इसके अलावा वे एक स्वच्छता विशेषज्ञ के रूप में भी कार्य करते हैं। वे इंसानों के लिए तमाम तरह के कचरे की श्रेणी में आने वाले पदार्थों का विखंडन कर दूसरे उपयोगी या गैर हानिकारक पदार्थों में बदलने का काम करते हैं। कीड़ों को गंवाना पृथ्वी के संतुलन (earth’s balance) को बहुत ही ज्यादा प्रभावित करेगा। लेकिन उससे कहीं ज्यादा नुकसानदायी इंसानों के लिए होगा। वहीं एक ताजा अध्ययन हुआ है जिसमें यह साफ किया गया है कि जिस प्रकार जलवायु में परिवर्तन हो रहा है उससे दुनिया के अधिकांश कीड़े नष्ट होने वाले हैं। रिसर्च में सामने आया है कि इस कारण 65 प्रतिशत कीड़े विलुप्त होने वाले हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण उष्मीय दबाव बढ़ गया है जिसने जानवरों के जीवन को खतरे में डाल दिया है।

उष्मीय दबाव जानवरों की जनसंख्या को अस्थिर कर सकता है

आपको बता दें कि कीड़ों की पृथ्वी के पर्यावरण (environment) के लिए बहुत ही ज्यादा महत्व होता है। जिस प्रकार जलवायु परिवर्तन हो रहा है उसे अगले 15 से 100 साल तक दुनिया के 65 प्रतिशत कीड़े धरती से विलुप्त होने वाले हैं। वैज्ञानिक का मानना है कि यदि ऐसा हो गया तो पर्यावरण के साथ इंसान भी संकट में आ जाएंगे। अधिकतर पर्यावरण पर हुए शोधों का आकलन मनुष्य पर ही आधारित है कि इससे मनुष्य को क्या नुकसान होने वाले हैं। मगर अभी पेड़-पौधों (Trees and Plants) और कीड़ों-मकौड़ों पर पड़ने वाले प्रभाव के संबंध में भी शोध हुए हैं। हालांकि कीड़ों-मकौड़ों पर पड़ने वाले प्रभाव पर बहुत ही कम शोध हुए हैं। इस संबंध में एक नया अध्ययन किया गया है। जिसमें सामने आया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण कीट-पतंगों का जीवन भी खतरे में है। वहीं इस शोध में यही भी सामने आया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाला जोखिम पूर्व अनुमान से दुगुना हो गया है। अध्ययन में सामने आया है कि अगली एक सदी तक 65 प्रतिशत कीट-पतंगे विलुप्त होने वाले हैं। इस अध्ययन के नतीजे नेचर क्लाइमेट चेंज (Nature Climate Change) में प्रकाशित हुए हैं। इसमें सामने आया है कि उष्मीय दबाव जानवरों की जनसंख्या को अस्थिर कर सकता है। शोधकर्ताओं ने बताया है कि इसके लिए उन्हें एक प्रतिमान की आवश्यकता थी, जिससे यह ज्ञात किया जा सके कि आखिरकार कीड़ों की जनसंख्या कैसे तापमान की विविधता से प्रभावित हो सकती है। शोधकर्ताओं ने इसे अपने अध्ययन का लक्ष्य बना लिया और शोध कर डाला। उन्होंने उन्नत प्रतिमानों के जरिए यह जानने का प्रयास किया कि अगली सदी तक कैसे ठंडे खून के कीड़ों की जनसंख्या तापमान बदलावों के प्रति प्रतिक्रिया करेगी। शोध में सामने आया है कि इससे 38 में से 25 प्रजातियों को खतरा पैदा हो गया है। इस अध्ययन में यह भी पता चला है कि पृथ्वी के पारिस्थितिकी तंत्र, जीन्स और प्रजातियों में बहुत ज्यादा बदलाव देखने को मिल रहे हैं, उन्होंने बताया कि विविधता को बनाए रखना पूरी दुनिया में इंसानों की सेहत, खाद्य सुरक्षा, स्वच्छ हवा और पानी, कृषि आदि के लिए बहुत जरूरी है।

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