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मिट्टी और बाहर खेलने से न रोंके, मोबाइल-टीवी से बच्चों में बढ़ रहीं ये बीमारियां

कनैडियन साइकॉलजिस्‍ट और चाइल्‍डहुड ट्रॉमा रिसर्चर डा. गाबोर माते ने पैरेंटिंग पर दिए कुछ टिप्‍स

मिट्टी और बाहर खेलने से न रोंके, मोबाइल-टीवी से बच्चों में बढ़ रहीं ये बीमारियां

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अगर आप अपने बच्चों (children) को तनाव और हार्ट से संबंधी बीमारियों से बचाना चाहते हो तो आपको अपने समय के बचपन से अपने बच्चों को रू-ब-रू करवाना होगा। धूल, मिट्टी और ग्राउंड या घर के आसपास खेलने से बच्चों को तनाव (Stress) जैसी कोई बीमारी नहीं होती है। इससे बच्चों को स्वास्थ्य (Health) भी ठीक रहता है। वहीं, लगातार टीवी-मोबाइल, वीडियो गेम-कम्प्यूटर देखने से बच्चों में विकार और बीमारियां को न्योता देने जैसा हैं। यह हम नहीं कह रहे। यह स्डटी (Study) में साबित हुआ है, इसलिए आगे से बच्चों को घर से बाहर खेलने के लिए भेजें और अगर वो मिट्टी से खेलें तो खेलने दें। आपको बताते चलें कि कनैडियन साइकॉलजिस्‍ट और चाइल्‍डहुड ट्रॉमा रिसर्चर डा. गाबोर माते (Canadian Psychologist and Childhood Trauma Researcher Dr. Gabor Maté) ने पैरेंटिंग पर कुछ टिप्‍स दिए हैं।

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डॉ. माते ने कहा कि मैं चाहता हूं कि हमारे बच्‍चे धूल, मिट्टी और कीचड़ में लकड़ी लेकर खेलें, न कि अपने डिजिटल स्‍क्रीन (Digital Screen) के सामने दिन भर बैठे रहे। लंदन स्‍कूल ऑफ इकोनॉमिक्‍स की प्रोफेसर डॉ. सोनया लिविंगस्‍टोन (Dr. Sonya Livingstone, Professor at the London School of Economics) ने एक किताब लिखी है। नाम है पैरेंटिंग फॉर ए डिजिटल फ्यूचररू हाउ होप्‍स एंड फियर्स अबाउट टेक्‍नोलॉजी शेप चिल्‍ड्रेन्‍स लाइव्‍स (Parenting for a Digital Future: How Hopes and Fears About Technology Shape Children’s Lives)। डॉ. लिविंगस्‍टोन लिखती हैं कि इस तथ्‍य से इनकार नहीं किया जा सकता कि डिजिटल युग में जितनी तेजी से हर तरह की जानकारी और ज्ञान बच्‍चों को उपलब्ध हो रहा है, वो इससे पहले की पीढ़ी के पास नहीं था, लेकिन पिछली पीढ़ी सिर्फ आसमान को ताकते, चकरी घुमाते, नदी में पैर डाले और मछली पकड़ते हुए जीवन की जो समझ और अंतदृष्टि हासिल कर रही थी, वो आज के बच्‍चों के पास मिसिंग है।

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रिसर्चर ने जताईं ये चिंताएं

बच्‍चों के बढ़ते स्‍क्रीन टाइम और घटती शारीरिक गतिविधियों को लेकर दुनिया भर में रिसर्चर तरह-तरह की चिंताएं जाहिर करते रहे हैं, लेकिन हाल ही में जरनल ऑफ द अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन में प्रकाशित कनाडा की यह स्‍टडी इस समस्‍या को नई रोशनी में देखने की कोशिश है। इस स्‍टडी के मुताबिक अत्‍यधिक डिजिटल स्‍क्रीन टाइम बच्‍चों को मानसिक और भावनात्‍मक रूप से बीमार कर रहा हैं वो डिप्रेशन के शिकार हो रहे हैं। इस स्‍टडी में शामिल बच्‍चों को दोनों तरह की गतिविधियों में (टीवी, वीडियो गेम्‍स और कम्प्‍यूटर और फिजिकल स्‍पोर्ट्स) पीयर ग्रुप के साथ इंटरेक्‍शन शामिल करके उनके बॉडी के हैपी और स्‍ट्रेस हॉर्मोन्‍स के साथ ब्रेन वायरिंग में हो रहे बदलावों को नापने की कोशिश की गई।

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बच्चों में इन बीमाारियों का डर

शोधकर्ताओं ने पाया कि डिजि‍टल एक्टिविटी के दौरान भी हैपी हॉर्मोन यानि डोपामाइन और सेरेटोनिन उतने की सिक्रेट हो रहे थे] जितना कि वो मैदान में दौड़ते और दूसरे बच्‍चों के साथ खेलते हुए हो रहे थे, लेकिन हार्ट रेट और कॉर्टिसॉल हॉर्मोन डिजिटल एक्टिविटी के दौरान बढ़ा हुआ पाया गया। कॉर्टिसॉल एक स्‍ट्रेस हॉर्मोन है। डॉक्‍टरों ने पाया कि डिजिटल एक्टिविटी एक खास तरह की खुशी देने के साथ.साथ तनाव को बढ़ा रही है, जबकि दूसरे बच्‍चों के साथ खेलते, बातें करते या किसी सामूहिक गतिविधि में हिस्‍सा लेने के दौरान यह स्‍ट्रेस हॉर्मोन सक्रिय नहीं था। रिसर्चर कहते हैं कि डिजिटल स्‍क्रीन टाइम भले ही हमें तात्‍कालिक खुशी दे रहा होए लेकिन लंबे समय में इसके परिणाम खतरनाक होते हैं।

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